प्रसंग- वश -चंद्रकांत अग्रवाल
सिर्फ प्रेम व भक्ति से ही पा सकते हैं हम श्री कृष्ण की अलौकिक कृपा भी
पिछले कॉलम में हमने चर्चा की थी कि किस तरह अपने लौकिक व भौतिक वैभव व
सुखों का त्याग किये बिना सिर्फ अपने सर्वस्व के पूर्ण समर्पण से हम
श्रीकृष्ण के परमप्रिय बन सकते हेैं। महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी के कुल
दीपक व पुष्टिमार्गीय पंथ प्रवर्तक गोस्वामी श्री कमलेश जी मुंबई के श्री
मुख से पहली बार मैनें भगवान शब्द की ऐसी व्याख्या सुनी व समझी जो अब तक
कहीं भी ना तो सुनी थी, ना ही किसी ग्रंथ में पढ़ी थी। गोस्वामी जी ने
भगवान को परिभाषित करते हुए कहा कि जो भक्त के भाव के अनुरूप स्वरूप में
दर्शन देकर वैसी ही कृपा करें,वहीं भगवान हुआ। श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में
भी इसी तरह अपने से जुड़े व प्रेम करने वालों पर अपनी कृपा बरसायी थी। कंस
की महासभा में वे कंस क ो काल रूप में,पहलवानों को एक मल्ल के रूप में,
अपने साथ आये ग्वालों को सखा रूप में तो स्त्रियों को कामदेव के रूप में
दर्शन देेते हैं। श्रीकृष्ण भक्ति में वास्तव में भाव समर्पण ही निर्णायक
होता हैं। अब यदि आज के दौर के भक्तों की पीड़ा की बात करें तो मुझे
नर्मदांचल के शुकदेव स्वरूप संत कमलकिशोर नागर जी का सत्संग याद आ जाता
हैं। वे मानते हैं कि हम पर श्रीकृष्ण कृपा इसलिए नही होती,क्योंकि हम
प्राय: सदैव श्रीकृष्ण से कुछ न कुछ सांसारिक सुख ही मांगते हैं। हम कभी भी
श्री कृष्ण से उनके प्रेम के लिए, उनकी कृपा दृष्टि के लिए, उनकी भक्ति के
लिए कोई प्रार्थना नही करते। अब जहां तक सांसारिक सुखों का सवाल हैं,वह तो
हमारे प्रारब्ध पर निर्भर होते हैं। इस जन्म में हमारे अच्छे कर्मों का
प्रतिफल भी यदि हमेें दुखों के रूप मेंं मिल रहा है तो यह हमारा जटिल
प्रारब्ध ही है जिसे हमें भोगना ही पड़ेगा पर हां यदि हम अपने प्रभु से
उनकी कृपा दृष्टि, उनक ा प्रेम व उनकी भक्ति सच्चे दिल से मांग लें तो जटिल
से जटिल प्रारब्ध भी बहुत सरलता से भोगने में सफल होते हैं। इसी तरह यदि
इस जन्म में हमारे बुरे से बुरे कर्माे क ा प्रतिफल भी यदि हमें संासारिक
सुखों के रूप में ,धन-वैभव के रूप में मिल रहा है तो यह भी हमारे अच्छे
प्रारब्ध का ही परिणाम होता हैं। यह अलग बात हैं कि बुरे कर्म करने वाले
ऐसा नही मानते बल्कि यह मानते हैं कि यह सब सुख उनको उनकी चालाकी से मिले
हैं । प्रारब्ध को ही भाग्य भी कहा जाता है। पर यह सब कहते हुए भी नागरजी
हमें भाग्यवादी नही बनने की सीख बार-बार देते हंै क्योंकि वे ऐसा मानते हैं
कि सिर्फ मनुष्य योनि ही ऐसी योनि है जिसमें प्रारब्ध को बदलने व प्रभु
भक्ति व शुभ कर्मो से बड़े से बड़े कष्ट को छोटे से छोटा कर देने की
आत्मशक्ति होती है। जरूरत सिर्फ इस आत्मशक्ति को जगाने की है। आज भी यदि
गोपी भाव की कातरता के साथ कोई भक्त श्रीकृष्ण को याद करता है तो प्रभु
अवश्य आते हैं। उन्होंने गोपियों को वृंदावन के निधि वन में महारास के साथ
उनके प्रेम क ो व उन्हें सदा के लिए अमर कर दिया। अध्यात्म व रूहानी प्रेम
का यह इंद्रधनुष आज भी वृंदावन के निधि वन में हर रात बनता हैं। पर कोई देख
नही पाया। जिसने देख लिया वह फिर किसी को भी कुछ भी बताने लायक या स्वयं
कुछ भी देखने लायक ही नहीं बचा। उसे संसार से भी जाना पड़ा । ऐसी मान्यता
आज भी पूरे ब्रज मंडल में मानी जाती हैं। कहते हैं कि प्रतिदिन रात्रिकाल
में निधि वन मेंं रहने वाले सैंकड़ों बंदर भी चमत्कारिक रूप से निधि वन से
बाहर आ जाते हैं। निधिवन में गोपियां वृक्षोंं की लताएं बनकर दिन में भी
नजर आती हैं पर उनकों स्पर्श करने में भी दोष माना जाता है। निधि वन की
मिट्टी में विलीन हो जाने की चाहत रहती है हर कृष्ण भक्त में । मैं जब भी
वृंदावन गया पाया कि श्री गिरिराज जी,यमुना जी और निधि वन आज भी श्री
कृष्ण काल के जीवंंत साक्षी हैं । जरूरत सिर्फ इस सच को महसूस करने की
हैं । प्रभु कृपा और भक्ति के बिना तो इनके दर्शन करना भी संभव नही हैं।
श्री कृष्ण के विछोह में गोपियों की सी तड़प को महसूस कर पाने की सामथ्र्य
आज कितने श्रीकृष्ण भक्तों में हैं। अपने भीतर प्रभु से मिलने की यह तड़प
जगाने के लिए नागर जी भी वास्तव में श्रीमद भागवत सप्ताह के अपने प्रवचनों
में मुख्यत: यही प्रयास करते दिखते हैं। वे कहते हैं कि सती बनों तो
सावित्री की तरह,पतिव्रता बनों तो अनुसुइया की तरह,ब्राह्मण बनों तो नरसिंह
मेहता की तरह, तपस्या करो तो भागीरथ की तरह, लगन लगाओ तो मीरा की तरह,
प्रेम करो तो गोपियों की तरह,कवि बनो तो कालीदास की तरह, दृढ़ता रखो तो
धु्रव की तरह,स्वाभिमानी बनो तो महाराणा प्रताप की तरह,श्रोता बनो तो
परीक्षित की तरह ,भक्त बनो तो प्रहलाद की तरह, पुत्र बनो तो श्रवण की
तरह,दास बनो तो हनुमान की तरह,भाई बनो तो भरत की तरह। पंचांग में प्रदोष
तो सभी लोग देखते हैं। अपने दोष देख लो, बस वही सच्चा पंचांग है। यदि आपके
अंदर सदगुण है तो रूप की क्या जरूरत है । आज के युग मेेे महापौर बनने का
प्रयास तो कई करते हैं पर महापुरूष बनने की बात तक कोई नही सोचता । जनता
सरकार बना सकती है,संत नहीं। सरकार बनाई जाती है पर संत बनाया नही जाता ।
सुंदर कांड करने की समिति आज भी हर गांव में नहीं है। पर लंका कांड करने की
समिति तो हर घर में हैं। नागर जी द्वारा व्यक्त की गई कुछ खरी -खरी बातों
का एक सुंदर संग्रह उनकी एक किताब शीर्षक शब्दों के छप्पन भोग में दर्ज है।
नागर जी कहते हंै कि भुगत शब्द से ही भगत शब्द बना है। दुख भोग कर ही भगत
बना जाता है। सच्चे भक्त की संसार में जितनी बिगड़ती है,उतनी ही भगवान के
यहां बनती है। आजकल लोग रावण की लंबाई तो जरूर नापते हैं,पर अपने कु कर्मों
की लंबाई कोई नही नापता। कच्चे भगत भी कच्ची शराब की तरह होते हैं, जिनमें
से केवल अभिमान की दुर्गंंध ही आती हैं। पश्चिम दुनिया की संस्कृति क ी और
मत भागो क्योंकि पश्चिम सदा अस्त करने का काम ही करता है। सूर्य भी जब
पश्चिम की और जाता है तो अस्त हो जाता है। अत: यदि हम पाश्चात्य संस्कृति
की और जाएंगे तो हमारा सार्थक जीवन भी अस्त हो जाएगा । नागर जी धूर्त
नेताओं पर बड़े करारे कटाक्ष करते हैं- वे पूछते हैं कि नोट लेकर जो फिर
नजर नही आए वह चोर कहलाता है । पर वोट लेकर जो नजर नही आए उसे क्या कहना
चाहिए? जिस तरह संसार का चिंतन करने से ब्लड प्रेशर बढ़ता है,उसी तरह भगवान
का चिंतन करने से भक्ति बढ़ती हैं। कपड़े तो चूहे भी काटता है व टेलर भी।
पर तुम अपना जीवन चूहों की तरह मत काटो। भजन करने से तो राक्षस की संतान
भी देवता बन जाती है,जैसे कि प्रहलाद चरित्र । इसी तरह भजन नही करने से
ब्राह्मण की संतान भी राक्षस बन जाती है,जैसे कि रावण चरित्र। विभीषण ने
कहा कि वे रावण के राज्य में रहकर भी नही बिगडें़ेगे तो कैकई ने कहा कि
हम राम के राज्य में रहकर भी नही सुधरेंगे। मंत्री,अधिकारी से संपर्क
बनाने व साधने की एक अंधी दौड़ मची हुई है आजकल। पर ऐसी दौड़ भगवान के लिए
हम नही लगा पाते जबकि मरकर तो हमें भगवान के यहां ही जाना है, किसी मंत्री
या अधिकारी के घर नही ं। पशु-पक्षी भी एक सीमा तक सिद्धांतवादी होतेे हैं
पर मानव अब वैसा नही रहा। अपने घरों में कुत्ता पालकर हम चिल्लाना तो सीख
गए पर बफादारी नही सीख पाए। जिस तरह लोहे पर रंग लगा देने से उसमें जंग
नही लगती,उसी तरह मनुष्य पर यदि भक्ति का रंग चढ़ जाए तो उसे फिर वासना
की जंग नही लगती। चाहे जितना धन वैभव आ जाए पर भक्ति के बिना यह वैसा ही
है जैसे कि किसी सुंदर नारी की नाक कट जाए। रविवार को फ्रें डशिप डे सबने
मनाया और इस दिन के भारतीय आदर्श श्रीकृष्ण व सुदामा बनकर सोशल मीडिया सहित
हर जगह छाए रहे। मुझे पुन: डाक्टर माधवी पटेल के सत्संग सत्र की स्मृतियां
ताजा हो गयीं। हालांकि उन्होनें श्रीकृष्ण सुदामा चरित्र समयाभाव के कारण
बहुत संक्षेप में अभिव्यक्त किया। पर मेरी इच्छा हो रही हैं। कि फ्रेें
डशिप डे को सार्थक बनाने हेतु मैं भी अपना चिंतन आज के इस कॉलम में जोडूं ।
श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता भौतिक व आध्यत्मिक दोनों दृष्टियों से
अद्वितीय थी, अद्भुत थी , बेमिसाल थी। क्योंकि उनमें एक दूसरे के प्रति
सिर्फ अनंत प्रेम था, अनंत समर्पण था। कहावत हैं कि मित्रता बराबरी वालों
से करनी चाहिए। आज के इस अर्थ प्रधान दौर में जब पैसा ही भगवान मानें
जाना लगा है , इस कहावत का विकृत अर्थ यह लगाया जाता हैं कि आर्थिक रूप
से जो आपकी बराबरी का हो, उसी से मित्रता करें। पर वास्तव में
श्रीकृष्ण का संदेश यही हैं कि बराबरी से तात्पर्य गुणों से,चरित्र
से हैं। बल्कि उससे भी आगे बढ़कर वे तो श्री सुदामा चरित्र के माध्यम
से यह संदेश देते हैं कि बराबरी वाले से नहीं बल्कि गुणों व चरित्र में
अपने से श्रेष्ठ से ही मित्रता करनी चाहिए। ताकि वो आपके व्यक्तित्व व
कृतित्व को अधिकाधिक तेजस्वी, प्रखर,ऊर्जावान व सार्थक बना सकें। तभी आपका
मित्रता करना भी सार्थक होगा अन्यथा आप अपने आपको ही धोखा दे रहें
होंगें। राजा परीक्षित द्वारा अपनी मृत्यु के दिन श्री शुकदेव जी से पूछे
गये प्रश्न जीवन के उत्तरार्ध की तेैयारी कै सें करें एवं रूकमणी विवाह
के प्रसंग का आध्यत्मिक संदेश सुनाते हुए कुछ समय पूर्व हवेली मंदिर के
मुखिया जी हरिकृष्ण जी ने इटारसी की ही धरा पर बहुत अद्वितीय चिंतन किया
था। वे बोले थे कि दशम स्कंध में प्रसंग आता हैं कि जीवात्मा को अपने जीवन
के उत्तरार्ध में ऐसी आध्यत्मिक तैयारी कर लेनी चाहिए कि उसकी आत्मा को
लेने श्री कृष्ण स्वयं रथ लेकर आयें, जिस तरह वे ,राजा परीक्षित को लेने
आये थे,रूकमणि जी को लेने आये थे व जिस तरह उन्होंनें 16 हजार 108 कन्याओं
को कारागार से मुक्त करा उनसे एक साथ एक अद़भुत व अलौकिक विवाह कर उन्हें
अपना बनाया था। सुदामा चरित्र का प्रसंग मुखिया जी ने जीवन दर्शन के कई
कोणों से बड़ी प्रखरता व जीवंतता के साथ सुनाया था। सुदामदेव एक ऐसे
ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण थे जिनके रोम रोम में श्रीकृष्ण बसे थे। उन्होंनें न
तो कभी अपनी ब्राह्मण जाति व अपनी विद्वता को अपने व परिवार के पेट
भरने का जरिया बनाया,न ही अपने मित्र द्वारिकाधीश से ही कभी कोई सहयोग
लिया। उनकी विद्वता, उनके आराध्य की भक्ति का एक स्त्रोत मात्र थी, उनकी
विद्वता में जो निजता थी वह बेमिसाल ही थी। अन्यथा वे किसी भी बड़े से
बड़े गुरूकुल से जुड़कर सुखमय जीवन जी सकते थे। पर उनकी भक्ति ही उनकाअसल
सुख थी। फिर उनकी पत्नी सुशीला भी नाम के अनुरूप पति के आदर्शों पर चलने
वाली अत्यंत धैर्यवान थी। पत्नी को ऐसा ही होना भी चाहिए। सुदामदेव का
प्रण था कि कभी भी किसी से कुछ भी मांगूंगा नही। यदि कोई यजमान साल भर का
अनाज देना भी चाहता तो सुदामदेव मना कर देते। संग्रह की वृत्ति उन्हें
कदापि स्वीकार नहीं थी। सुशीला जी से जब अपने बच्चों की भूख बर्दाश्त
नहीं हुई तो उन्होंंंनें सुदामदेव से अनुरोध कियाआप अपने मित्र
द्वारिकाधीश से एक बार मिल तोआओ। मैं कुछ मांगने नहीं भेज रही बल्कि दर्शन
करने भेज रहीं हँू। साथ में एक पत्र भी दिया, जिसमें अत्यंत मर्यादा व
स्वाभिमान के साथ लिखा कि हे द्वारिकाधीश, माह में दो एकादशी आती हंै जिन
पर व्रत करना चाहिए पर मेरा पूरा परिवार तो प्रतिदिन ही एकादशी कर रहा
हैं। पढ़कर द्वारिकाधीश रो पड़े व कहने लगे कि मेरा दीनानाथ कहलानाआज
झूठ हो गया। उन्होंने पूर्व दिशा में खड़े सुदामदेव को बिदा करते हुए
तिलक करना चाहा तो देखा कि उनके भाल पर लिखा था,श्री क्षय। इसे पलटकर
उन्होंनें यक्षश्री कर दिया व पूर्व दिशा के मालिक इंद्र को हंसते देखा
तो इंद्र का वैभव भी सुदामा के परिवार को उसी क्षण दे डाला। पर अपने मित्र
को पहनाए पीतांबर को भी उतारने को कह अपनी फटी पुरानी घोती ही पहनने को
कहा। इस प्रसंग के गहरे संदेश है। श्रीकृष्ण नहीं चाहते थे कि दुनिया यह
कहे कि कभी किसी से कुछ नहीं मांगने का प्रण करने वाले उनके मित्र
सुदामा द्वारिकाधीश के महल से एक पीताम्बर पहनकर भी कैसे निकलें?
श्रीकृष्ण को सुदामा की खुद्दारी की रक्षा की ज्यादा चिंता हेैं। पर वे
सुशीलाजी द्वारा दी गयी चिवड़े या पोहे की पोटली जो सिर्फ उनके लिए दी
गयी थी,सुदामा से छीनकर खा जाते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते कि एक बार फिर
सुदामा उनके हिस्से का अन्न खाकर पाप के भागी बनें जैेसे कि गुरूकुल में
रहते हुए, जंगल में खाने हेतु गुरू माता द्वारा लिए दिये गये उनके हिस्से
के चने भी सुदामा खा गये थे औेर भीषण दरिद्रता भोगी। हालांकि आज के दौर
मेेंं भगवान के हिस्से का व उनके नाम का ,भगवान के मंदिरों के हिस्से का
देश भर में कौेन, कितना, कैसे खा रहा हैं,सब जानते हैं। कलयुग में उनको
सुदामा की तरह दरिद्रता का फल नहीं मिल रहा हंै। उल्टे वे उत्तरोत्तर
वैभवशाली हो रहें है। कदाचित इसीलिए कि इस जन्म में तो जोभी सुख हमें
मिलेगा,अपने पूर्व जन्म के प्रारब्ध से ही मिलेगा। ऐसा कहा जाता हैं कि
श्रीमदभागवत के विभिन्न प्रसंगों के प्रतिश्रुति फल केअनुसार सुदामा
चरित्र का प्रतिश्रुति फल यह होता हैं कि इसे प्रेम से सुनने व कहने वाला
बड़े से बड़े सुख में भी अपने आराध्य को,अपने भगवान को कभी नहीं भूलता।
यह बहुत बड़ा फल हेैं क्योंकि जीवात्मा प्राय: यहीं तो धोखा खा जाता हैं और
इस कारण उसके जीवन का उत्तरार्ध बिगड़ जाता हैं। अंतिम यात्रा की तैयारी
होने पर भी उसे यह भान नहीं रहता कि उसे किस तरह व किसके सांथ कहा जाना
हैं, नये सफर पर। अगले अंकों की कडिय़ों में हम पुन: गोस्वामी जी द्वारा
अभिव्यक्त व महाप्रभु जी द्वारा रचित सिद्धांत रहस्य का चिंतन करने अथवा
पुन: उसकी भूमिका को ही आगे बढ़ायेंगे, मैं स्वयं नहीं जानता क्योंकि
श्रीकृष्ण जैसी प्रेरणा देंगे वैसी ही चलेगी मेरी कलम,वैसे भी इस चिंतन के
भाव भी श्रीकृष्ण की कृपा से ही गतिमान हैं। जय श्री कृष्ण।
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