Monday, 21 August 2017

प्रसंग-वश- चंद्रकांत अग्रवाल                                                                 आज के दौर में तो श्रीकृष्ण ही सार्थक जीवन के नायक हो सकते हैं?
देश भक्ति व देश प्रेम से पुन: अब तीसरी कड़ी में हम अपने श्रीकृष्ण प्रेम पर आते हैं। सोमवार 21 अगस्त 2017 से ही पत्रकार से चिंतक व फिर भागवत कथाकार बनकर देश भर में लोकप्रिय पंडित विजयशंकर मेहता ने शहर की फिजाओं में श्रीमदभागवत कथा ज्ञान गंगा का संवाहन प्रारंभ किया। प्रथम दिवस उन्होनेंं सार्थक जीवन जीने की कला व  मृत्यु भय से मुक्ति की बात करते हुए जीवन में परिश्रम,पारदर्शिता,प्रेम,व पवित्रता के चार अमृत तत्वों को रेखांकित किया। आज के हमारे कालम का विषय भी  इसी चिंतन से जुड़ा हैं।  कुछ बड़े संत ऐसा कहते हैं कि श्रीराम का चरित्र अनुकरणीय है पर श्रीकृ ष्ण का चरित्र सिर्फ चिन्तन करने के लिए ही होना चाहिए हम सांसारिक लोगों के लिए। हालांकि संसार के लोग श्रीकृष्ण चरित्र का अनुसरण करने में ही सुविधा व सुख महसूस करते हैं। पिछले कुछ दिनों तक मैंने बहुत सोचा। अचानक चण्डीदत्त शुक्ल व कैलाश वाजपेयी जैसे धुरंधर साहित्यकारों का श्रीकृष्ण पर चिन्तन भी पढऩे को मिल गया, श्रीकृष्ण कृपा से ही। तब मुझे लगा कि पहले हम श्रीकृष्ण को तो पूरी तरह समझें अन्यथा श्रीकृष्ण की माया लीला,रास लीला की घटनाओं का मर्म ही समझ नहीं पाएंगे कभी और मृत्युपर्यन्त श्रीकृष्ण चरित्र का मूर्खता पूर्ण अनुसरण करते हुए अपने जीवन को भक्ति  मार्ग पर चलकर भी निरर्थक कर देंगे। तो आइए श्रीकृष्ण चरित्र का अनुसरण करने के पूर्व, उस संदर्भ में सोचने के भी  पहले हम यह तो समझ लें कि श्रीकृष्ण वास्तव में हैं क्या? कृष्ण दरअसल संपूर्णता का नाम हैं। कृष्ण मनुष्य हैं। देवता स्पष्ट हैं। योगिराज हैं। गृहस्थ हैं। संत हैं। योद्धा हैं। चिंतक हैं। संन्यासी हैं। लिप्त हैं। शिशु हैं तो संकट में हैं। किशोर हैं तो युद्ध कर रहे हैं। युवा हैं तो महाभारत की दिशा तय कर रहे हैं। देव होने के बावजूद चमत्कार नहीं करते । सच तो यह है कि कृष्ण केवल कर्म करते हैं। कर्म पर ही विश्वास करते हैं और इसी की सीख देेते हैं। जिंदगी की मुकम्मल परिभाषा समझने के लिए कृ ष्ण भाव को परखने और उसमें अंतर्निहित संदेश को कार्य-व्यवहार में उतारने की बेहद जरूरत हैं। एक शिशु ,जिसके जन्म से पहले उसकी हत्या की बिसात बिछाई जा चुकी हैं। जन्म लेने के तुरंत बाद उसे जैविक माता-पिता से दूर कर दिया गया। पलना-बढऩा एक ऐसे घर में, जहां कोई रक्त -संबंध नहीं हैं। बचपन में ही कितनी ही साजिशों से जूझना पड़ा । एक तरह से कृष्ण की पूरी शख्सियत सत्ताओं से युद्ध करते हुए ही सुदृढ़ होती हैं। जिस तरह कि हमारे देश में 1857 से लेकर 1947 तक आजादी जंग चली थी। श्रीकृष्ण के लिए भी कंस से लड़ाई इतनी आसान नहीं थी। पहले उसके भेजे दुष्ट आक्रमणकारियों से युद्ध, फिर इंद्र की सत्ता को चुनौती और अंतत: कंस का संहार।  कृष्ण के पूरे व्यक्तित्व की एक खास बात को हम बार-बार देखते हैं, वह यह है कि वे माया -मोह के बंधनों से अलग हैं। कंस उनका संबंधी था और महाभारत के समय कौरव -पांडव, दोनों निकट के रिश्ते के, लेकिन कृष्ण यह जानते हैं कि धर्म की रक्षा करने के लिए संबंधों के जाल में फंसने की जगह कर्तव्य की पुकार सुनना आवश्यक हैं। अगर इसी तथ्य को अपने जीवन में उतारना हो तो संदेश स्पष्ट हैं- किसी भी गलत बात को स्वीकार न करें। भले ही वह बात,आदेश या नीति बड़ी से बड़ी सत्ता की और से क्यों न आई हो। दूसरा संदेश यह है कि अपने कर्तव्य के आड़े कितना ही निकट का व्यक्ति क्यों न हो-उसे राह का रोड़ा न बनने दें। यहां व्यक्ति का मतलब दूसरे का होना ही आवश्यक नहीं हैं। यदि अपने मन का अहंकार भी अच्छे काम में बाधा बन रहा हो तो उसका भी शमन किया जाना चाहिए। कृष्ण का नेतृत्व ,उनके अंदर निहित संतुलन की शक्ति को ही दरअसल रेखांकित करता हैं। हम योगी, भोक्ता ,नेता, सेनानी ,विद्वान,चिंतक और निर्णायक होने के गुण अगर व्यक्तित्व में समाहित कर पाएं तो न सिर्फ संसार को जी सकेंगें, बल्कि जीवन के होने का मतलब भी बूझ सकेंगें। कृष्ण के बारे में सोचें तो ऐसे शिशु के बारे में सोचें ,जिसके जन्म लेने से पूर्व ही सत्ता उसकी हत्या कर डालने का दृढ़ संकल्प किए, व्यग्र है कि कब जन्म हो और कब उसका वध-संहार पूरा किया जाए। कृष्ण के बारे में सोचें तो ऐसे नवजात के बारे में सोचें, जिसे धरती छूते ही उसकी मां से विलग कर दिया गया। पूरी पृथ्वी पर पसरे पड़े सारे के सारे मिथक,सारा इतिहास , सभी लोक गाथाएं खंगाल लें-कहां मिलेगा आपको कृष्ण-सा जन्मजात आउटसाइडर। गर्भ के अंधकार से यूं बाहर फेंके गए हम सभी रोए हैं, मगर शायद ही कोई होगा-ऐसा लडख़ड़ा कर चलने वाला बच्चा, जिसे सुनना पड़ा हो यह ताना कि वह गोरा नहीं काला हैं। यशोदा उसकी मां नहीं, उसने तो बस उसे पाला हैं। दुधमुंही उम्र और इतना विषाक्त आसपास ? कोई और होता तो कच्ची उम्र में ही न्यूरॉटिक हो जाता या क्या पता कि आज के किशोरों की तरह गोकुल में नंदमहल की खिड़की से यमुना में छलांग लगा लेता। कृष्ण ने वह सब नहीं किया। आयु बढऩे के साथ-साथ,ग्वाल-बालों के साथ गोचारण और ब्रज की धरती पर तरह-तरह के खिलवाड़ । यहां तक कि इंद्रपूजा का विरोध भी कर डाला। कृष्ण ही थे, जिन्होंने कहा कि वर्षा तो अपने आप आती हैं, इंद्र की अभ्यर्थना का अर्थ क्या? कृष्ण ने इतनी कम उम्र में साहसिक कदम उठाया और पल भर में सारा प्रसाद हठ करके वन और पर्वत में रहने वालों को बांट दिया। वर्षा जब धारासार होने लगी तो ब्रजवासियों को गोवद्र्धन पर्वत के नीचे शरण दी। श्रीकृष्ण चरित्र का निहितार्थ समझें। इंद्रियों का अर्थ होता हैं गो। एक बार पहाड़ उठा ले कोई, डूबने से बचा ले अपनों को तो समझिए कि इंद्रियां सध गई। अब उनके साथ काल के प्रवाह में बहने की जगह उन्हें ऊध्र्वमुखी करने को राम कहा जाएगा। यह चेतना का रहसीला तल हैं। एक बार स्वाद पा लेने के बाद रस का, एक-एक गोपी के वास्ते ,कृष्ण व्यसन हो गए। यमुना की रेत कृष्ण , मोर की तान में,चारे में कृष्ण, दधि मथानी में, रोटी में कृष्ण,साग-भाजी में कृष्ण,चूल्हे की आग,राख,धड़कन,कलेवा, कदंब के पात-पात में कृष्ण। सांस, नींद,आंगन, दालान, द्वार, वीथिका, करील फूल, गूदड़ी, गोधूलि, फटी साड़ी, गागर, जगत में कुए के छलके पानी में। अपने प्रतिबिंब थके अंग,घने बादल, बौछार, उड़ी मिट्टी की गंध, हर एक रंग में इंद्रधनुष के, कहां-कहां कृष्ण नहीं दीख पड़ते थें।  ऐसा होना हो जाए किसी को शायद तभी आभास हो सकता है रास लीला का। कृष्ण को जब मथुरा जाना पड़ा, तब से लेकर आगे का जीवन तो ओर भी त्रासद हैं। जरासंध हमला कर देता है। कालयवन से प्राण बचाने के लिए भागना पड़ता हैं। यही नहीं , भिक्षा मांग खाना भी पड़ता हैं। प्रवर्षण पर्वत पर दावानल घेर लेता हैं। नंगे पांव भागना अनिवार्य हो जाता हैं। सत्यभामा के पिता के घर डाका पड़ता हैं। द्वारिका पर आकाश मार्ग से हमला होता हैं। घरेलू वातावरण का हाल यह कि बलराम भी विश्वास नहीं करते। बेटा कहना नहीं मानता। हारकर स्वयं कृष्ण ने अपनों का वध किया और अंत में यह कि प्रभास क्षेत्र में जब उनके पांव में जराव्याध का बाण लगा तो वहां भी कृष्ण यही समझाते हैं। भू और ख कोरे अक्षर नहीं-भूमंडल से लेकर खगोल तक सब तरफ भूख का पसारा हैं। बेकार है पश्चाताप, जराव्याध। सब कुछ यहां सब कुछ का आहार हैं। कृष्ण आगे कहते हैं-सीधी बड़ी साफ हैं-परिभाषा पाप की। आज के संदर्भ में इसे ही भ्रष्टाचार कहते हैं। नीति समझ में आ जाए नैतिकता,जैसा सिक्का, दूसरा पासा उस सिक्के का-ऐसा कुछ होता हैं पाप या भ्रष्टाचार । भाग रही दुनिया मनोरथ की मारी। झर रहा झरना मनोरथ का। नदी के तो होते हैं फिर भी किनारे, मनोरथ का निर्झर पर तट विहीन हैं। देह छोडऩे से पूर्व श्रीकृष्ण ने जराव्याध को क्षमा कर दिया।   जराव्याध, भ्रमवश अपने द्वारा किए गए शर संधान पर पश्चाताप करता हुआ केशव  की शरण में आया था। शरणागति हमेशा सुरक्षा के लिए, सहायता के लिए होती हैं। श्रीकृष्ण ने व्याध को क्षमा के ही साथ, स्वर्ग सुख का वरदान भी दिया, इसलिए श्रीकृष्ण को प्रसन्न पारिजात भी कहा गया हैं। श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व को परिभाषा में बांध पाना असंभव हैं। उनका चरित्र सौ पंखुरियों वाले कमल जैसा हैं। सभी अध्येता ऐसा मानते हैं कि पूर्ण संपूर्णता, उनका विराट दिव्य तत्व कुरूक्षेत्र के मैदान में ही पूरी तरह खिलता हैं। जहां उन्होंने अर्जुन के रथ का सारथी होना स्वीकार किया। सारयति अश्वान् इति सारथि:। जो हमारे जीवन का संचालन करे,उसका नाम सारथी हैं। दुर्योधन अहंग्रस्त और स्वार्थी हैं, इसीलिए उसका सारथी अज्ञातनामा हैं, जबकिअर्जुन समर्पित योद्धा हैं, कृष्णार्पित। हालांकि वह अब भी द्विधाग्रस्त है। ऊहापोह में है। अपने यहां। एक मान्यता हैं: कलि:शयानो भवति-जो सो गया, वह कलियुग हो गया। संजिहानस्तु द्वापर:-जो करवट बदलें,द्विधा में हो, वह द्वापर हैं। उत्तिष्ठन् त्रेता भवति:-जो उठ बैठा,वह त्रेता हैं। कृतं संपद्यते चरन: अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जो आगे बढ़ चला जो, वह सतयुग हो गया। सोचिए, श्रीकृष्ण न हुए होते तो ललित कलाओं का क्या होता। इतिहास साक्षी है कि हर कला की धुरी श्रीकृष्ण पर टिकी है। श्रीकृष्ण रसेश्वर भी हैं और योगेश्वर भी। कृष्ण ढेरों विरोधों का संगम हैं- नर्तक-योद्धा, संन्यासी-सम्राट, निष्कपट-छलिया,अजातशत्रु-मित्र,चोर-साधु और निर्मोही -प्रेमी। कृष्ण सभी का युग्म हैं। हम सब कृष्ण की गिरफ्त  में हैं। ये जो कृष्ण में भासमान चौंसठ कलाएं हैं , खोजने पर हम सब में भी चार - छ कलाएं मिल ही जाएंगी तो भी कहां दिव्य पुरूष कृष्ण और कहां हम। तो ऐसी अलौकिक पीड़ाएं भोगी हैं मेरे श्रीकृष्ण ने। इतना पढऩे समझने के बाद भी यदि किसी भक्त का श्रीकृष्ण के चरणों में प्रेम न जगे, समर्पण न हो पाए तो उससे ज्यादा दुष्ट और कौन होगा? मेरे श्रीकृष्ण से कुछ मांगने से पहले अब दस बार सोचना। और मांगना भी हो तो उसके पहले उससे सच्चा प्रेम करना होगा व तबश्रीकृष्ण की कृपा के लिए प्रार्थना करने के योग्य समझना अपने आपको। श्री कृष्ण का जीवन चरित्र देखकर ही शायद मां कुंती ने उनसे दुखों का वरदान मांगा था ताकि वे अपने श्री कृष्ण को सदैव अपने पास रख सकें । प्राय:लाखों करोड़ों भक्तों का पूरा जीवन अपने को श्री क ृष्ण की कृ पा हेतु प्रार्थना करने के योग्य बनाने में ही खत्म हो जाता है पर वे ....।
श्रीराम की मर्यादा को तो कोई अपने जीवन में आत्मसात ही नही कर पाता पूरी तरह से। गोलियों से छलनी राष्ट्रपिता बापू के अंतिम शब्द थे-हे राम । इतना संयमित व समर्पित जीवन जीते हुए भी श्री राम की मर्यादा को आत्मसात करने के तुरंत बाद ही वे चले गए। इसके पहले  कि उनके जीवन में श्री कृष्ण कृपा का प्रवेश हो पाता वे,चले गए, अनंत की एक अलौकिक यात्रा पर। पर मैं सोचता हँू कि यदि वे नहीं जाते 10-15 साल और जी पाते तो देश के काले अंग्रेजों को देश से बाहर का रास्ता दिखाने में उन्हें श्री कृष्ण की चौंसठ कलाओं में से 3-4 कलाओं का आश्रय लेना ही पड़ता। सत्याग्रह का मार्ग छोड़कर श्री कृष्ण के मार्ग की तरह ही अपनों पर ही वार करने के लिए विवश होना पड़ता। एक और महाभारत युद्ध लडऩा ही पड़ता। जिस तरह श्री कृष्ण लड़े थे। भले ही शस्त्र के बिना लड़ते। वे अभिमन्यु बनते या अर्जुन यह तो नही जानता पर इतना जरूर जानता हँू कि आज के भारत का वर्तमान इतना त्रासदीपूर्ण,नही होता। जनलोकपाल के लिए किसी अन्ना को आमरण भूख हड़ताल न करनी पड़ती। काले अंग्रेजों की संख्या राजनीति व जीवन के अन्य क्षेत्रों में इतनी बड़ी न होती, जितनी आज हैं। इतने सारे दु:शासन व दुर्र्याेधन इस तरह निर्बाध रूप से देश में नहीं घूम रहे होते। अगले अंक में हम पुन: श्रीकृष्ण के चरित्र के ही कुछ और मर्म समझेंगे व फिर समझेंगे श्रीराम का चरित्र । जय श्रीकृष्ण। जय श्रीराम।

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