आध्यात्मिक

प्रसंग-वश- चंद्रकांत अग्रवाल                                            

सिर्फ और सिर्फ अपने सर्वस्व का पूर्ण समर्पण ही हमें श्रीकृष्ण का परमप्रिय बना सकता है

विगत शनिवार तक अविराम तीन दिनों तक श्रीद्वारिकाधीश मंदिर सत्संग भवन में कलयुग में 500 वर्ष पूर्व के कालखंड के योगेश्वर श्रीकृष्ण के परमप्रिय व सर्वाधिक कृपापात्र महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी के कुल के एक दीपक  व पुष्टिमार्गीय श्रीकृष्ण भक्ति पंथ के परम ज्ञानी श्री गोस्वामी जी कमलेश जी कांदीबली मुंबई द्वारा ब्रह्म संबंध, भगवान शब्द का अलौकिक भावार्थ व महान ग्रंथ सिद्धांत रहस्य विषय पर केंद्रित अद्भुत ज्ञान गंगा संवाहित की गयी। पुष्टिमार्गीय वल्लभ पंथ में गुरू दीक्षा को ही ब्रह्म संबंध लेना कहा जाता हैं। जो श्री वल्लभाचार्य जी के कुल के  ही किसी संत द्वारा प्रदान किया जाता हैं। तीनों दिनों के सत्संग का भावार्थ यदि अत्यंत संक्षेप में लिखा जाये तो यही होगा कि गृहस्थ होते हुए भी, लौकिक व भौतिक वैभव का त्याग किये बिना सिर्फ अनंत प्रेम व अनंत समर्पण से ही कोई भक्त श्रीकृष्ण का परमप्रिय बन सकता हैं। गोस्वामी जी की अद्वितीय विद्वता जिस पानी की सी सरलता की तरह संवाहित हुई,यह किसी ज्ञान सत्र में बहुत कम ही देखने सुनने को नसीब होती हैं। वहीं दूसरी ओैर रविवार को एक अन्य ज्ञान सत्र साईंकृष्णा रिसोर्ट में पेशे से ईएनटी विशेषज्ञ चिकित्सक व स्वभाव से श्रीकृष्ण की साधिका डॉ. माधवी पटेल के अपने आराध्य व भक्ति ज्ञान और कर्म योग के महा सम्राट योगेश्वर श्री कृष्ण के जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे भक्ति, नीति, प्रीति, रति,मैत्री और इन सबसे बढ़कर पूर्ण समर्पण पर केंद्रित प्रस्तुतिकरण का साक्षी बनने का सौभाग्य भी मिला। हालांकि माधवी जी की भाषा व शैली अत्यंत साहित्यिक व अलंकारों से सराबोर थी। द्वापर युग के जिन कुछ प्रसंगों को उन्होंनें करीब डेढ़ घंटे के अपने धारा प्रवाह सत्संग में रेखांकित करने का प्रयास किया,स्वाभाविक रूप से उन प्रसंगों की इतने कम समय में व्याख्या करना कदाचित बड़े से बड़े संत व विद्वान के लिए भी संभव नहीं होता,ऐसा मुझे लगा। पर व्याख्यान में समय की मर्यादा का प्रतिबंध मानना ही पड़ता हैं। अच्छा होता यदि वे अपने व्याख्यान को किसी भी एक प्रसंग पर ही केेंंद्रित रखती। पर उन्होनेें अपना केनवॉस काफी बड़ा रखा और उसमें श्रीकृष्ण चरित्र के अलौकिक रंग भरने के लिए उनके पास समय काफी कम था। दोनों कार्यक्रमों के ज्ञान सत्रोंं में मुझे एक तथ्य जो कॉमन लगा वह था श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम व पूर्ण समर्पण का भाव । अत: आज के अपने इस कॉलम को मैं इस सर्वस्व व पूर्ण समर्पण के भाव पर ही केंद्रित कर रहा हँू। वैसे भी दोनों कार्र्यक्रमों के कुल चार दिन के  चार ज्ञान सत्रोंं को एक पेज के कॉलम की एक ही किश्त में पूर्ण कर देने जैसी विद्वता भी मुझमें नहीं हेंैं। प्रयास करूंगा की दो या तीन अंकों में इसे पूरा कर सकूं । मैं अपना लेखकीय केनवॉस छोटा रखते हुए प्रयास करूंगा कि इस बार के कॉलम में माधवी जी द्वारा प्रस्तुत श्रीकृष्ण चरित्र के सभी प्रसंगों को प्रेम व भक्ति  की तूलिका से जीवंत बना सकंू। माधवी जी ने द्रोपदी चरित्र की इटारसी की धरा पर कदाचित पहली बार अद़भुत व्याख्या की। मैने भी विस्तार से पहली बार सुनी, बहुत अच्छा लगा। पर माधवी जी माफ करें मेरी दृष्टि में तो प्रेम व समर्पण को समझने के लिए राधा चरित्र व श्रीकृष्ण- राधा युगल चरित्र ही सर्वश्रेष्ठ हैं। मुझे नहीं पता कि आप तक मेरे विचार कभी पहुंच पायेंगें या नहीं  पर खैर...प्रारंभ ही अंत से कर रहा हँू।  अर्थात श्रीकृष्ण के अपने देवलोक गमन के प्रसंग से। क्योंकि न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता हैं कि यह प्रसंग बहुत संक्षेप में ही पर श्रीकृष्ण के समग्र चरित्र को रेखांकित करने में बहुत कुछ सक्षम हैं।
    हिरण्य, कपिला और सरस्वती का संगम। प्रभास क्षेत्र में दूर तक फैली अपूर्व शांति अश्वत्थ के सहारे मौन लेटा है कालपुरूष। हवा के साथ विशाल वृक्ष की डालियां जाने किस संवाद में खोई हैं। खोए हुए तो कृष्ण भी हैं। महाप्रयाण से पूर्व जीवन गाथा के पन्ने उलट-पलट रहे हैं। यमुना के जल में धीमे-धीमे घुल रहा है मोर पंख का रंग और इस जल के बीच सुंदर-सजल आंखें झिलमिलाती हैं, सवाल करती हैं- जा रहे हो कान्हा पर क्या सचमुच अकेले जा सकोगे? सवाल करती इन आंखों के साथ जाने कितनी आंखें याद हो आती है उन्हें । वसुदेव के साथ गोकुल भेजती देवकी की आंखें, ऊखल से बांधती यशोदा की आंखें, गोकुल में ग्वाल और गोपियों की आंखें, राजसभा में पुकारती द्रौपदी की आंखें , कुरूक्षेत्र में खड़ें अर्जुन की आंखें, प्रभास उत्सव के लिए बिदा करती रूक्मिणी की आंखें, यमुना की आंखें और यमुना की धार में विलीन होती परम प्रिया की आंखें। उन आंखों का जल कृष्ण की आंखों से बहने लगता है- तुमसे अलग होकर कहां जाऊंगा? छाया से काया कैसे अलग हो सकती है भला। जहां तुम हो, वहां मैं हूं। कृष्ण की एकमात्र शरण तुम ही तो हो। ऐसा परिहास न करो। मेरी शरण की तुम्हें क्या आवश्यकता कान्हा? कहां मैं एक साधारण-सी ग्वालिन और कहां तुम जैसा असाधारण पुरूष । तुम तो सारी सृष्टि को शरण देते हो। तुम मेरे शरणाार्थी कैसे हो सकते हो? परिहास नहीं सखी। जन्म लेते ही जिसे मां के आंचल को छोड़कर भवसागर की लहरों के बीच उतरना पड़ा, उसकी पीड़ा को तुम्हारे अतिरिक्त कौन हर सकता है? सारी सृष्टि को शरण देने की सामथ्र्य भले हो कृष्ण में, लेकिन कृष्ण को शरण देने की सामथ्र्य केवल तुम्हारे हदय में है। कौन है, जिसकी शरण का आकांक्षी है तीनों लोकों को तारने वाला असाधारण पुरूष? कृष्ण को शरण देने की सामथ्र्य रखने वाला यह हदय किसका है? कृष्ण को शरण देने वाला यह हदय उसी आराधिका का है, जो पहले राधिका बनी और फिर राधिका से कृष्ण की आराध्या हो गई। कृष्ण आराधना करते हैं, इसलिए वे राधा हैं या वे कृष्ण की आराधना करती है, इसीलिए राधिका कहलाती है। सच, बहुत कठिन है इसको परिभाषित करना, क्योंकि इसकी परिभाषा स्वयं कृष्ण हैं। खुद को असाधारण होने की सीमा तक साधारण बनाए रखने वाली यह किशोरी कृष्ण को अनायास ही मिली थी भागवत में। भागवत,रस का गीत हैं। उस गीत का रस भी और कोई नहीं, यही आराधिका है। कृष्ण राधा से पूछते हंै, राधे। भागवत में क्या भूमिका होगी तुम्हारी। राधा कहती है, मुझे कोई भूमिका नहीं चाहिए  कान्हा, मैं तो बस तेरी छाया बनकर रहूंगी, तेरे पीछे-पीछे । छाया हां, कृष्ण के प्रत्येक सृजन की पृष्ठभूमि में है।  गोवद्र्धन को धारण करने वाली तर्जनी का बल भी यही छाया है और यही छाया है लोकहित के लिए मथुरा से द्वारिका तक की विषम यात्रा करने वाले कृष्ण की आत्मशक्ति। संपूर्ण ब्रज रंगा है कृष्ण रंग में, कदंब से लेकर कालिंदी अर्थात यमुना तक। सब ओर कृष्ण ही कृष्ण। लेकिन इस कृष्ण की आत्मा बसती है राधा में। वृंदावन की कुंज गलियां हों या मथुरा के घाट हर ओर, हर तरफ बस एक नाम, एक रट,राधा राधा राधा । बांके का बांकपन भी राधा है और योगेश्वर का ध्यान भी राधा है। कृष्ण के विराट को समेटने के लिए जिस राधा ने अपने हदय को इतना विस्तार दिया कि सारा ब्रज ही उसका हदय बन गया। उसी राधा के बारे में भागवत में गोपियां पूछती है कि यह आराधिका आखिर है कौन? पहले तो कभी दिखी नहीं। कौन है वो मानिनी, जिसकी वेणी गूंथता है उनका श्याम, जिसके पैर दबाता है सलोना घनश्याम और हां जब वो रूठ जाती है तो मोर बनकर नृत्य भी करता है ।गोपियां ही नहीं, कृष्ण भी पूछते हैं, बूझत श्याम, कौन तू गोरी । लेकिन राधा को बूझना इतना सरल नहीं और राधा को बूझ पाने से भी कठिन है- राधा के प्रेम की थाह बूझ पाना। इसी अथाह प्रेम की थाह पाने के लिए एक बार लीलाधर ने एक लीला रची। स्मृतियां कृष्ण को खींच ले गईं उत्सव के क्षणों में। हर ओर खुशी का सैलाब। हास-परिहास के बीच अचानक पीड़ा से छटपटाने लगे कृष्ण।  ढोल, ढप, मंजीरे खामोश होकर मधुसूदन के मनोहारी मुख पर आती-जाती पीड़ा की रेखाओं को पढऩे लगे।  चंदन का लेप शूलांतक वटी कोमलांगी स्पर्श सब व्यर्थ। वैद्य लज्जित से एक-दूसरे को निहार रहे थे। रानी सत्या ने डबडबाती आंखों से पूछा तो उत्तर मिला, मेरे किसी परम प्रिय की चरण धूलि के लेप से ही मेरी पीड़ा ठीक हो सकती है। कृष्ण की पीड़ा बढ़ती ही जा रही है। सोलह हजार रानियां-पटरानियां करोड़ों भक्त, सखा, सहोदर सब प्राण होम करके भी अपने प्रिय की पीड़ा हरने को तैयार हैं, लेकिन प्रभु के मस्तक पर अपनी चरण धूलि लगाकर नर्क का भागी कोई नहीं बनना चाहता। सबने अपने पांव पीछे खींच लिए। राधा ने सुना तो नंगे पांव भागती चली आई। आंसुओं में चरण धूलि का लेप बनाकर लगा दिया कृष्ण के  भाल पर। सब हतप्रभ थे। यह कैसी आराधिका है, इसे नर्क  का भी भय नहीं। कृष्ण मुस्कुरा दिए, जिसने मुझमें ही तीनों लोक पा लिए हों,वो अन्यत्र किसी स्वर्ग की कामना करें भी तो क्यों? सारे संसार को मुक्त करने वाला इसीलिए तो बंधा है इस आराधिका से। कृष्ण  सबको मुक्त करते हैं, लेकिन राधा कभी मुक्त नहीं करती कृष्ण को। कृष्ण खुद भी कहां मुक्त होना चाहते हैं, ब्रज की इस गोरी के मोहपाश से। कभी-कभी रूक्मिणी छेड़ती हैं, क्या सचमुच बहुत सुंदर थी राधा? कृष्ण कहते हैं हां, बहुत सुंदर इतनी सुंदर कि उसके सामने मौन हो जाती हैं, सौंदर्य की समस्त परिभाषाएं। सूर्योपराग के समय कुरूक्षेत्र में सब उपस्थित हुए हैं । राधा भी आई है, नंद-यशोदा, गोप-ग्वाल, गोपियों के साथ। रूक्मिणी आश्चर्य में हैं । इस राधा के आते ही सारा परिवेश कैसे एकाएक नीला हो गया है। और कृष्ण का नीलवर्ण राधा के बसंत से मिलकर कैसे सावन-सावन हो उठा है। यों रूक्मिणी खुद स्वागत कर रही हैं राधा का, लेकिन कै से बावले हुए जाते हैं कृष्ण। रूक्मिणी खुद स्वागत कर रही है राधा का,लेकिन कैसे बावले हुए जाते हैं कृष्ण। एक जलन-सी उठती है मन में और यही जलन रूक्मिणी सौंप देती हैं राधा को गर्म दूध में। कृष्ण का स्मरण कर एक सांस में पी जाती हंै राधा । सारा द्वेष, सारी जलन, सारी पीड़ा, लेकिन कृष्ण नहीं झेल पाते। कृष्ण के पैर दबाते समय रूक्मिणी ने देखा कि श्री कृष्ण के पैरों में छाले हैं। मानों गर्म खौलते तेल से जल गए हों। यह क्या हुआ द्वारिकानाथ,ये फफोले कैसे? कृष्ण बोले, प्रिय राधा के हदय में बसता हूं मैं। तुम्हारे मन की जिस जलन को राधा ने चुपचाप पी लिया देखो वही मेरे तन से फूट पड़ी है। राधा को बड़भागिनी कहता है यह संसार लेकिन बड़भागी तो कृष्ण हैं, जिन्हें राधा जैसी गुरू मिली , सखी मिली, आराधिका मिली। जिसने उन्हें प्रेम, समर्पण और त्याग की वर्णाक्षरी सिखाई। तभी तो दानगढ़ में दान मांगते हैं कृष्ण । दानगढ़ जो बसा है सांकरी खोर और विलासगढ़ से विपरीत दिशा में। यहां राधा के चरणों में झुककर याचक हो जाते हैं कृष्ण । हे राधे बड़ी दानी है तू, सुना है तेरे बरसाने में जो भी आता है, वो खाली हाथ नहीं जाता। मुझे भी दान दे। प्रथम दान अपनी रूप माधुरी का। दूसरा दान तेरे अनंत रस और विलास का। दानगढ़ में कृष्ण को दिया गया, ये महादान ही पाथेय बन जाता है कृष्ण का, गैया चराने वाले गोपाल से द्वारिकाधीश बनने तक की लंबी यात्रा में। कुरूक्षेत्र से लेकर प्रभास तक राधा का यही प्रेम तो जीवन रसधार बनकर बहता रहा कृष्ण के भीतर। गीता का आधार भी यही प्रेम है औेर महारास का रस भी। वेणु हो या पांचजन्य, दोनों में एक ही स्वर फूटता है।  एक ही पुकार उठती है, राधे तेरे नैना बिंधो री बान । कृष्ण से जुड़ी हर स्त्री राधा होना चाहती है। स्वयं कृष्ण भी राधा हो जाना चाहते हैं। लेकिन कृष्ण जानते हैं कि राधा का पर्याय केवल राधा ही हो सकती है, इसीलिए तो कृष्ण बार-बार आना चाहते हैं राधा की शरण में। आंखों में एक चमक-सी कौंधती है।  दूर कालिंदी की लहरों पर एकांत पथिक-सा नि:शब्द बढ़ रहा है राधा की मन्नतों का एक दीया। कृष्ण मौन सुन रहे हैं, डूबती द्वारिका के अंधेरों से निकलती अर्थहीन आवाजें और उन आवाजों में घुलता एक सवाल, जा रहे हो कान्हा ,पर क्या सचमुच अकेले जा सकोगे?  अगले अंक के कालम के लिए वास्तव में तो यह भूमिका स्वरूप ही है। क्योंकि वल्लभाचार्य जी को 500 साल पहले ठाकुर जी ने अर्थात श्रीकृष्ण ने स्वयं सामने आकर भक्ति,प्रेम, व समर्पण का जो ज्ञान दिया था और जो सिद्धांत रहस्य ग्रंथ में समाहित हैं व जिसे गोस्वामी जी कमलेश जी ने तीन दिनों में समझाया,उसे समझने के लिए यह भूमिका आवश्यक हेैं।

प्रसंग-वश- चंद्रकांत अग्रवाल 

श्रीराम कथा का मर्म: स्वार्थ का त्याग करना ही है धर्म

परिस्थितियों ने हमें ऐसी जगह लाकर खड़ा कर दिया हैं कि केवल दो ही विकल्प हैं या तो हम धर्म को चुने या महाविनाश को । लेकिन यहां मंथन करने की आवश्यकता हैं। विनाश अगर हमने चुना तो मानव मूल्यों का कोई औचित्य नहीं रहेगा। पर ाात्मा ने जिन उद्देश्यों को लेकर हमें यह मानव जीवन दिया हैं उसके लिए धर्म को अपनाना चाहिए। देश या समाज के लिए तो धर्म जरूरी हैं। परिवार सुखी रखना है तो भी धर्म के सदमार्ग पर चलना ही होगा। कलिकाल में विश्व महाविनाश की ओर अग्रसर हो रहा हैं लेकिन धर्म से इस महाविनाश को रोका जा सकता हैं। आज संसार सागर को भयमुक्त बनाने का अंतिम विकल्प हैं राम कथा आत्मसात करने समाज को प्रेरित करना। श्रीराम जन्म उत्सव मनाने का एक ही लक्ष्य होना चाहिए कि श्रीराम के आदर्शों का अनुसरण प्रत्येक मनुष्य के अंदर हो। आज पर्यावरण के प्रदूषण से ज्यादा हमारे जीवन में विचारों का प्रदूषण फैला है। संसार सागर में तीन व्यक्तियों को पद भ्रष्ट नहीं होना चाहिए। पहला शासक, दूसरा संत और तीसरा वैद्य। संत के भ्रष्ट होने पर संस्कृति बिगड़ जायेगी। शासक पद भ्रष्ट होगा तो समाज का सुधार नहीं होगा। वैद्य यदि पद भ्रष्ट होगा तो देह का नाश हो जायेगा। समाज का सुधार सिर्फ बातें करने से नहीं होगा,जैसा कि आजकल नेताओं,अफसरों,संतों व पत्रकारों द्वारा अपनी अभिव्यक्ति से हो रहा हैं,अपितु अपनेआपको और अपने चरित्र के बदलने से होगा। कलियुग में मानव के चेहरे और चरित्र में परिवर्तन कोई कर सकता हैं तो वो हैं सिर्फ संत और सत्संग। यह उद्गार आचार्य प्रवर महेंंद्र मिश्र ने द्वारिकाधीश मंदिर में चल रहे राम जन्म महोत्सव में कहे। श्री मिश्र ने कहा नेता समाज में आते हैं नोट, वोट और सपोर्ट मांगने के लिए लेकिन संत जब समाज में आते हैं आपकी, हमारी खोट मांगने के लिए। संत मुनि पावर हाउस हैं। जिनसे जीवन में ऊर्जा और उन्नति, प्राप्त होती हैं। उन्होनें देश की सार्थक खुशहाली हेतु सत्य, नैतिकता,चरित्र ,विवेक,धर्म, मानवता, पारदर्शिता व संवेदनशीलता की अनिवार्यता बतायी,सोमवार तक की श्रीराम कथा के अपने प्रवचनों में। हालांकि उन्होंने सूत्र रूप में ही यह संदेश दिये , विस्तार से व्या���� या नहीं की। आज का यह कालम वहीं से शुरू करेंगे। श्री मिश्र के इन सूत्रों की ही विस्तार से चर्चा करते हुए अब अपने मन की कुछ बातें करूं तो ये सभी उपरोक्त तत्व हमें अब इतिहास के पन्नों में सिर्फ राम-राज्य में ही देखने को मिलते हैं। अत: राम-राज्य के भावार्थ को जानने का ही प्रयास करेंगे। यह भाजपा के राम-राज्य से कौसों दूर है। सिर्फ श्रीराम मंदिर के अयोध्या में निर्माण से तो रामराज्य आयेगा नहीं, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। कांग्रेस का तथाकथित गांधीवाद तो इससे जमीं-आसमां जैसी दूरी पर है। तो तीसरे मोर्चो के तथाकथित समाजवाद का तो मैं यहां कोई उल्लेख करना भी जरूरी नहीं समझता। खैर।़ रामराज्य की चर्चा तो प्राय: सभी करते हैं। रामराज्य की कल्पना या उपमा या अलंकरण की बातें बुद्धिजीवी भी प्राय: करते रहते हैं। पर मेरे विचार से रामराज्य के मूलतत्वों को लेकर भारतीय जनमानस में, उतना गहन चिन्तन कम ही हुआ है जितना कि भारतीय संस्कृति की रक्षा हेतु- आवश्यक है। जो चिन्तन हुआ भी तो वह संत-महात्माओं, आध्यात्मिक गुरूओं व विद्वान् वक्ताओं, विद्वान् लेखकों के स्तर पर हुआ है। सामाजिक व राजनैतिक स्तर पर यह दुर्भाग्यवश नहीं हो पाया है या हुआ भी है तो इसमें दिखावा ही ज्यादा रहा है। मूर्धन्य मानस-मर्मज्ञ श्री राम किंकर जी उपाध्याय व श्री मुरारी बापू ने अवश्य ही अपने अद्वितीय चिन्तन के अनन्त आयामों में रामराज्य के मूलतत्वों को जन जन तक पहुँचाने का सार्थक प्रयास किया है। पर हमारी सामाजिक व राजनैतिक त्रासदियों के चलते आम आदमी रामराज्य के मूल तत्वों को आत्मसात् नहीं कर पाया है। अत: इसी चिंतन को आगे बढ़ाते हुए महेंद्र मिश्र यही कहते हैं कि आज की परम आवश्यकता यही है कि राम के देश का जन जन अपने आदर्श मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम के रामराज्य के मूल तत्वों,चरित्र,विवेक,धर्म, मानवता आदि को आत्मसात् करे, तभी वह अपने, समाज व राष्ट्र के जीवन को सार्थक बना सकेगा। मूर्धन्य मानस मर्मज्ञों जैसे रामकिंकर जी ,मुरारी बापू आदि के मानस चिंतन ने मुझे हमेशा काफी प्रभावित किया हैं। वैसे तो रामचरित-मानस में तुलसीदास ने संकेतों में ही रामराज्य के सभी गूढ़ मूल तत्व बड़ी सहजता से रेखांकित किए हैं। रामराज्य का अर्थ बहुमत का राज्य नहीं। रावण का जहां निरंकुश राज्य है तो दशरथ का प्रजाप्रिय राज्य है। फिर भी यह राजतंत्र ही हुआ। राम बहुमत को नहीं सर्वमत को मानते हैं।आज तो भारतीय लोकतंत्र में किसी पार्टी को यदि एक मत का काम चलाऊ बहुमत भी मिल जाए तो वह इसे अपनी नैतिक व ऐतिहासिक जीत बताती है। पर श्रीराम सर्व में किसी तरह का संशोधन स्वीकार करने को तैयार नहीं। इसी कारण वे दो व्यक्तियों के मत को भी इतना महत्व देते हैं। लोग तो यह कहेंगे कि दो मतों का क्या महत्व हैं? पर राम एक-एक व्यक्ति के मनोभाव पर विचार करते हैं। कैकेयी व मंथरा रामराज्य का विरोध क्यों कर रही है? इसका एक सहज उत्तर तो यह दिया जा सकता है कि दोनों के चरित्र में दोष है पर राम ऐसा नहीं मानते। राम यह मानते हैं कि इनके मन में कोई न कोई आशंका है। इस घटना को तुलसीदास दूसरे कोण से देखते हैं। दशरथ जी रामराज्य बनाना तो चाहते हैं पर रामराज्य की उनकी कल्पना सिर्फ इतनी है कि कल स्वर्ण सिंहासन देंगे और रामराज्य स्थापित हो जाएगा। पर यह तो पर परागत राजतंत्र होता। ठीक वैसा ही जैसा कि दशरथ, अज या दिलीप का था। पर वास्तव में रामराज्य तो अंत: करण का समग्र परिवर्तन है। जब तक समाज पूरी तरह नहीं बदल जाता, तब तक रामराज्य भला कैसे साकार हो सकता है? परोक्ष रूप में तो अयोध्या में नैतिकता का राज्य है पर यहां भी संस्कारों की दुर्बलता है। लंका में यह भयावह रूप में है तो अयोध्या में सूत्र या बीज रूप में है। जब लोभ से अंत: करण आक्रान्त हो जाता है तो कैकेयी का कोप भवन में जाना स्वाभाविक ही है। तीन प्रमुख विकारों लोभ, क्रोध व काम में से लोभ व क्रोध तो स्वयं कैकेयी के रूप में प्रकट हो चुके है, बचा काम तो वह दशरथ जी ने अपने व्यवहार से रेखांकित कर दिया। कैकेयी के प्रति उनकी आसक्ति सर्वज्ञात है। अब जहां लोभ, क्रोध व काम तीनों आ जाएं तो रामराज्य कैसे बन सकता है? इस अवसर पर पहली बार तुलसीदास जी ने दशरथ की आलोचना की है। कैकेयी राम को बुरा नहीं पर साधु मानती है। अत: दशरथ जी से पूछती है कि बताइये तपस्या श्रेष्ठ हैं या भोग? यहां भोग से अभिप्राय सत्ता से है। धर्म का विकृत रूप यहां साफ दिखता है। तपस्या श्रेष्ठ है यदि दूसरे का लड़का करे तो, सत्ता श्रेष्ठ है यदि हमारे बेटे को मिले। भारतीय राजनीति में विगत 6 दशकों से जनसेवा का यही पाखंड चरमोत्कर्ष पर है, चाहे देश की बात हो,प्रदेश की बात हो या अपने शहर की । समाज का यह दर्शन तो रामराज्य नहीं निर्मित कर सकता। तब रामराज्य कैसे बनता? एक युद्ध श्री राम ने लंका में लड़ा व दूसरा युद्ध भरत जी ने अयोध्या में लड़ा। दोनों युद्धों के समापन पर रामराज्य का निर्माण हुआ। राम का युद्ध बाहरी है तो भरत का आंतरिक। जब तक अयोध्या में मंथरा व लंका में शूर्पणखा का चिन्तन है, रामराज्य नहीं बन सकता। इन दोनों विचारधाराओं का परा ाव होना जरूरी है। त्रेता युग का यह सत्य ही आज का सत्य भी है भविष्य का भी रहेगा। जब भी रामराज्य बनेगा, यह मंथरा व शूर्पनखा की विचारधारा खत्म होने के बाद ही बनेगा। आज तो हर पार्टी में मंथराओं व शूर्पणखाओं की भरमार है। पार्टियों की तो छोडि़ए हर बड़े नेता,बड़े ब्यूरोक्रेट, बड़े संत, बड़े पत्रकार , बड़े उद्योगपति आदि के राजनैतिक परिवेश में हैं। यदि राम यह कहते हैं कि अन्याय नहीं सहूँगा व लोभ के विरूद्ध लडूँगा तो यह लढ़ाई लोभ के विरूद्ध लोभ की ही होती। ऐसी लड़ाई तो आज हमारे समाज में प्रतिदिन हो रही है। बंटवारे के लिए लड़ाई तो समाज की शाश्वत जंग है। अत: राम ने लोभ के विरूद्ध यह लड़ाई त्याग से लड़ी, भरत ने भी ऐसा ही किया। इसी तरह राम ने शूर्पणखा रूपी काम के विरूद्ध लड़ाई वैराग्य से लड़ी। तुलसीदास ने कहीं भी कैकेयी को श्रेष्ठ स्थान नहीं दिया पर रामायण मेें राम बार बार केकैयी की प्रशंसा करते हैं। यह राम की उदारता का परिचायक है, कैकेयी की महिमा का नहीं। रामराज्य वैचारिक या ह्रदय की क्रान्ति का प्रतीक है। लोग सोचते हैं कि भले ही सूर्यवंश की पर परानुसार राज्य ज्येष्ठ व्यक्ति को मिले पर यह पर परा अनुचित है। जिस सूर्य ने आज तक प्रकाश देने में छोटे बड़े का भेद नहीं किया उसी सूर्यवंश में छोटे भाई को राज्य न देकर बड़े को देना मानो सूर्य के आदर्श को ठेस पहुँचाना है। वे विचार करते हैं कि या तो राज्य सब भाईयों को मिलना चाहिए या छोटे भाई को। राम की यही भावना रामराज्य का मूलाधार है। उधर भारत जी का चरित्र भी रामराज्य की अस्मिता व मर्यादा को ही रेखांकित करता है। भरत को क्या जरूरत थी, राजधानी की सीमा से बाहर झोंपड़ी में रहकर सिंहासन पर राम की खड़ाँऊ रखकर शासन को राम-राज्य की सेवा के रूप में करने की। किन्तु भरत जी ज्ञानी थे, जानते थे कि राज्य के सिंहासन पर सिर्फ और सिर्फ राम का ही अधिकार हैं? पर आज कलियुग में हम क्या परिवार के छोटे पुत्र में ऐसे चरित्र व संस्कार के दर्शन करने की कल्पना भी कर सकते है? भरत जी का धर्म-विवेचन काफी सूक्ष्म है। वे गुरू वरिष्ठ से पूछते हैं कि मेरे सिंहासन पर बैठने से सत्य की जीत होगी या असत्य की? पिता जी तो सत्य का राज्य चाहते थे पर असत्य रूपी मंथरा के षडयंत्र से राम को बनवास दे दिया गया अत: मैं यदि राज्य स्वीकार कर लूं तो मंथरा का संकल्प पूरा होगा या पिताश्री का। जो दिखाई दे रहा है वह सत्य है या शब्द के पीछे का भाव सत्य है। क्या धर्म को अधर्म के हाथ का शस्त्र बनने दिया जाए। यह समस्या समाज में कई बार आती है। अधर्म की चतुराई यह है कि वह स्वयं अपने बल से तो लाभ पाता ही है, साथी ही धार्मिकों की सत्य निष्ठा से भी लाभ उठा लेता है। जैसे कि प्रसंग आता है कि रावण यज्ञ करके शक्ति प्राप्त करने की कोशिश करता है, यह सोचकर कि राम तो यज्ञ रक्षक है, वे मेरे यज्ञ को नष्ट नहीं करेंगे। इस प्रकार अधर्म, धर्म से लाभ प्राप्त करने की कोशिश करता है। पर राम अपनी सेना को आदेश देते हैं कि रावण का यज्ञ नष्ट कर दो। अर्थात् राम यह संदेश देते हैं कि जो धर्म, अधर्म को पनपाये या बढ़ाए वह धर्म ही नहीं है, अत: उसका नाश कर देना ही ठीक है। श्री कृष्ण ने भी ऐसा ही किया था। महाभारत काल में सूर्य का बेटा कर्ण है और इन्द्र का बेटा अर्जुन। वहीं रामायण काल में सूर्य का पुत्र सुग्रीव है और इन्द्र का पुत्र बाली। रामायण काल में भगवान् ने सूर्य के पुत्र सुग्रीव की रक्षा की, उससे मित्रता की तथा इन्द्र के पुत्र का वध किया। वहीं महाभारत काल में भगवान् ने इन्द्र-पुत्र अर्जुन की रक्षा की एवं सूर्यपुत्र कर्ण का बध कराया। अर्थात् कौन किस लक्ष्य की पूर्ति में लगा है, यही महत्त्वपूर्ण है। ऐेसे प्रकाश की रक्षा आवश्यक नहीं जोसत्य को आलोकित करे। असत्य की प्रतीक मंथरा ने सत्य का लाभ लेना चाहा। दथरथ जो सत्यवादी है। इसी प्रसंग को पुन: राम व भरत के दृष्टिकोण से देखें। जहां भरत का तर्क है कि उनके पिता धर्म का उचित निर्णय नहीं कर पाए, वहीं राम का कथन है कि पिजाश्री ने धर्म का बिल्कुल ठीक निर्णय किया। जब इस संबंध में चित्रकूट में विवाद होता है तो राम कहते हैं कि पिता श्री, मां कैकेयी के ऋणी थे। बिना मां का ऋण चुकाएं वे मुझे राज्य देने लगे थे। तो मां को यह कहने का पूरा अधिकार था कि पहले मेरा ऋण चुकाए, फिर मनमानी कीजिए। अब सवाल यह उठता है कि सही कौन है भरत या राम?धर्म की वैसे तो कोई निश्चित व्या या नहीं होती पर उसकी एक प्रमुख कसौटी यह है कि जिसमें स्वार्थ का त्याग करना पड़े, वहीं धर्म है। राम ऐसी व्या या करते हैं जिससे उनको त्याग स्वीकारना पड़े। अत: आत्मत्याग ही धर्म की सही व्या या है। यही रामराज्य की भी आधारशिला थी और जब इस दर्शन को आत्मसात् किया गया तभी रामराज्य बन पाया। इस तरह आत्मत्याग रामराज्य का एक प्रमुख मूल तत्व है। 14 वर्ष की अपनी वनयात्रा में राम सभी का दु:ख हरते हैं। रामराज्य में न तो किसी व्यक्ति को काल का दु:ख था, न कर्म क ा न स्वभाव का, न गुण का । यह सब आखिर कहां चल गया? स्पष्ट हैं कि काल, कर्म व स्वभाव के इन दु:खों को राम व उनके परिवार ने स्वयं झेल लिया व अपना आनंद सारे संसार को बाँट दिया। यही रामराज्य है। आज की भारतीय राजनीति में इस तत्व की स त जरूरत है, तभी राजनीति से लोकहित सध सकेंगे। राम की वनयात्रा व भरत का त्यागशील राज्य ही रामराज्य की नींव हैं। इस तरह यह स्पष्ट हुआ कि रामराज्य का श्री गणेश तो राम ने अपने वनवास में ही किया। सर्वप्रथम चित्रकूट में ही रामराज्य बनता है। चित्रकूट में मोह का विनाश हो चुका है, विवेक का राज्य है, शांति व सुमति वहां की रानियाँ है। यही रामराज्य का वह विस्तार है जो आगे चलकर प्रकट होने वाला है। मानों दोनों भाईयों ने बंटवारा कर लिया हो। दोनों लड़ाई लडऩे जा रहे हैं। एक तो लंका में तो दूसरे को अयोध्या में लडऩी है लड़ाई। राम की लड़ाई तो दिखाई भी देती है पर भरत का युद्ध तो दिखाई भी नहीं देता। गुरू वशिष्ठ जब भरत जी से कहते हैं कि राजा के बिना समाज उच्छृंखल हो जाएगा। तब भरत जी कहते हैं कि सत्ता को अन्यायपूर्वक प्राप्त करने वाला, कैसे न्यायपूर्वक राज्य कर सकता है? बहुत गहरी बात कही थी भरत जी ने जो आज के संदर्भ में भी उतनी ही प्रांसगिक है। राम राज्य के मूल तत्त्वों में एक और अत्यन्त सशक्त तत्व राजा का प्रजा के अंतिम व्यक्ति तक से आत्मीय प्रेम का आदर्श है। अर्थात् वे नीच व्यक्ति पर भी दया नहीं करते अपितु उससे स्नेह भी करते हैं। राम न तो किसी की तुच्छता रेखांकित करते हैं, न ही स्वंय की श्रेष्ठता। केवट प्रसंग से भी यही तत्त्व स्पष्ट होता है। राम जब किसी को कुछ देते हैं तो सामने वाले को बड़ा बना देते हैं। क्योंकि उनका दर्शन ही यह है कि यदि देने वाले ने पाने वाले को बड़ा नहीं बनाया तो देने की सार्थकता ही सिद्ध नहीं होती। राम यही संदेश देते हैं कि लेने देने की सार्थकता तो तभी है जब वह देेेने वाले के अंत: करण से अहंकार को मिटा दे व लेने वाले के मन से हीनता को। यही तो रामराज्य की अद्वितीय नैतिकता है। आज के दौर में जब धन सर्वोपरि बनता लगता है, रामराज्य का यह दर्शन, समाज व देश के लिए अमृततुल्य ही है। पर क्या आज देश पर शासन करने वाली केंद्र/राज्य सरकारों, जननायकों व ब्यूरोक्रेट्स को इस चिन्तन में कोई रूचि होगी। ऐसी रूचि प्राय: देखने को नहीं मिलती। पर हां उप्र के नवागत सीएम योगी आदित्यनाथ जरूर प्रारंभ में काफी उ ाीदेें जगाते दिख रहें हैं। हमेें यह नहीं भूलना चाहिए कि यूपी में इतने बड़े बहुमत से भाजपा की ताजपोशी इस बार राममंदिर के मुद्दे पर नहीं बल्कि रा ा राज्य के सबके साथ, सबके विकास के मुद्दे पर ही हुई हैं। अन्यथा राममंदिर के मुददे पर तो भाजपा को 300 सीटें भी नहीं मितली थी । जाहिर है कि प्रजा/जनता सिर्फ कोई प्रतीक नहीं यथार्थ चाहती हैं। राम राज्य जैसा यथार्थ। पर यदि उपरोक्त में कोई एक भी इस चिन्तन को थोड़ा सा भी आत्मसात कर पाया तो मेरा यह लेखन 2017 की इस रामनवमीं पर सार्थक समझूंगा। जय श्रीराम ।।


































































































































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