प्रसंग-वश- चंद्रकांत अग्रवाल
सिर्फ और सिर्फ अपने सर्वस्व का पूर्ण समर्पण ही हमें श्रीकृष्ण का परमप्रिय बना सकता है
विगत शनिवार तक अविराम तीन दिनों तक श्रीद्वारिकाधीश मंदिर सत्संग भवन में कलयुग में 500 वर्ष पूर्व के कालखंड के योगेश्वर श्रीकृष्ण के परमप्रिय व सर्वाधिक कृपापात्र महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी के कुल के एक दीपक व पुष्टिमार्गीय श्रीकृष्ण भक्ति पंथ के परम ज्ञानी श्री गोस्वामी जी कमलेश जी कांदीबली मुंबई द्वारा ब्रह्म संबंध, भगवान शब्द का अलौकिक भावार्थ व महान ग्रंथ सिद्धांत रहस्य विषय पर केंद्रित अद्भुत ज्ञान गंगा संवाहित की गयी। पुष्टिमार्गीय वल्लभ पंथ में गुरू दीक्षा को ही ब्रह्म संबंध लेना कहा जाता हैं। जो श्री वल्लभाचार्य जी के कुल के ही किसी संत द्वारा प्रदान किया जाता हैं। तीनों दिनों के सत्संग का भावार्थ यदि अत्यंत संक्षेप में लिखा जाये तो यही होगा कि गृहस्थ होते हुए भी, लौकिक व भौतिक वैभव का त्याग किये बिना सिर्फ अनंत प्रेम व अनंत समर्पण से ही कोई भक्त श्रीकृष्ण का परमप्रिय बन सकता हैं। गोस्वामी जी की अद्वितीय विद्वता जिस पानी की सी सरलता की तरह संवाहित हुई,यह किसी ज्ञान सत्र में बहुत कम ही देखने सुनने को नसीब होती हैं। वहीं दूसरी ओैर रविवार को एक अन्य ज्ञान सत्र साईंकृष्णा रिसोर्ट में पेशे से ईएनटी विशेषज्ञ चिकित्सक व स्वभाव से श्रीकृष्ण की साधिका डॉ. माधवी पटेल के अपने आराध्य व भक्ति ज्ञान और कर्म योग के महा सम्राट योगेश्वर श्री कृष्ण के जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे भक्ति, नीति, प्रीति, रति,मैत्री और इन सबसे बढ़कर पूर्ण समर्पण पर केंद्रित प्रस्तुतिकरण का साक्षी बनने का सौभाग्य भी मिला। हालांकि माधवी जी की भाषा व शैली अत्यंत साहित्यिक व अलंकारों से सराबोर थी। द्वापर युग के जिन कुछ प्रसंगों को उन्होंनें करीब डेढ़ घंटे के अपने धारा प्रवाह सत्संग में रेखांकित करने का प्रयास किया,स्वाभाविक रूप से उन प्रसंगों की इतने कम समय में व्याख्या करना कदाचित बड़े से बड़े संत व विद्वान के लिए भी संभव नहीं होता,ऐसा मुझे लगा। पर व्याख्यान में समय की मर्यादा का प्रतिबंध मानना ही पड़ता हैं। अच्छा होता यदि वे अपने व्याख्यान को किसी भी एक प्रसंग पर ही केेंंद्रित रखती। पर उन्होनेें अपना केनवॉस काफी बड़ा रखा और उसमें श्रीकृष्ण चरित्र के अलौकिक रंग भरने के लिए उनके पास समय काफी कम था। दोनों कार्यक्रमों के ज्ञान सत्रोंं में मुझे एक तथ्य जो कॉमन लगा वह था श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम व पूर्ण समर्पण का भाव । अत: आज के अपने इस कॉलम को मैं इस सर्वस्व व पूर्ण समर्पण के भाव पर ही केंद्रित कर रहा हँू। वैसे भी दोनों कार्र्यक्रमों के कुल चार दिन के चार ज्ञान सत्रोंं को एक पेज के कॉलम की एक ही किश्त में पूर्ण कर देने जैसी विद्वता भी मुझमें नहीं हेंैं। प्रयास करूंगा की दो या तीन अंकों में इसे पूरा कर सकूं । मैं अपना लेखकीय केनवॉस छोटा रखते हुए प्रयास करूंगा कि इस बार के कॉलम में माधवी जी द्वारा प्रस्तुत श्रीकृष्ण चरित्र के सभी प्रसंगों को प्रेम व भक्ति की तूलिका से जीवंत बना सकंू। माधवी जी ने द्रोपदी चरित्र की इटारसी की धरा पर कदाचित पहली बार अद़भुत व्याख्या की। मैने भी विस्तार से पहली बार सुनी, बहुत अच्छा लगा। पर माधवी जी माफ करें मेरी दृष्टि में तो प्रेम व समर्पण को समझने के लिए राधा चरित्र व श्रीकृष्ण- राधा युगल चरित्र ही सर्वश्रेष्ठ हैं। मुझे नहीं पता कि आप तक मेरे विचार कभी पहुंच पायेंगें या नहीं पर खैर...प्रारंभ ही अंत से कर रहा हँू। अर्थात श्रीकृष्ण के अपने देवलोक गमन के प्रसंग से। क्योंकि न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता हैं कि यह प्रसंग बहुत संक्षेप में ही पर श्रीकृष्ण के समग्र चरित्र को रेखांकित करने में बहुत कुछ सक्षम हैं।हिरण्य, कपिला और सरस्वती का संगम। प्रभास क्षेत्र में दूर तक फैली अपूर्व शांति अश्वत्थ के सहारे मौन लेटा है कालपुरूष। हवा के साथ विशाल वृक्ष की डालियां जाने किस संवाद में खोई हैं। खोए हुए तो कृष्ण भी हैं। महाप्रयाण से पूर्व जीवन गाथा के पन्ने उलट-पलट रहे हैं। यमुना के जल में धीमे-धीमे घुल रहा है मोर पंख का रंग और इस जल के बीच सुंदर-सजल आंखें झिलमिलाती हैं, सवाल करती हैं- जा रहे हो कान्हा पर क्या सचमुच अकेले जा सकोगे? सवाल करती इन आंखों के साथ जाने कितनी आंखें याद हो आती है उन्हें । वसुदेव के साथ गोकुल भेजती देवकी की आंखें, ऊखल से बांधती यशोदा की आंखें, गोकुल में ग्वाल और गोपियों की आंखें, राजसभा में पुकारती द्रौपदी की आंखें , कुरूक्षेत्र में खड़ें अर्जुन की आंखें, प्रभास उत्सव के लिए बिदा करती रूक्मिणी की आंखें, यमुना की आंखें और यमुना की धार में विलीन होती परम प्रिया की आंखें। उन आंखों का जल कृष्ण की आंखों से बहने लगता है- तुमसे अलग होकर कहां जाऊंगा? छाया से काया कैसे अलग हो सकती है भला। जहां तुम हो, वहां मैं हूं। कृष्ण की एकमात्र शरण तुम ही तो हो। ऐसा परिहास न करो। मेरी शरण की तुम्हें क्या आवश्यकता कान्हा? कहां मैं एक साधारण-सी ग्वालिन और कहां तुम जैसा असाधारण पुरूष । तुम तो सारी सृष्टि को शरण देते हो। तुम मेरे शरणाार्थी कैसे हो सकते हो? परिहास नहीं सखी। जन्म लेते ही जिसे मां के आंचल को छोड़कर भवसागर की लहरों के बीच उतरना पड़ा, उसकी पीड़ा को तुम्हारे अतिरिक्त कौन हर सकता है? सारी सृष्टि को शरण देने की सामथ्र्य भले हो कृष्ण में, लेकिन कृष्ण को शरण देने की सामथ्र्य केवल तुम्हारे हदय में है। कौन है, जिसकी शरण का आकांक्षी है तीनों लोकों को तारने वाला असाधारण पुरूष? कृष्ण को शरण देने की सामथ्र्य रखने वाला यह हदय किसका है? कृष्ण को शरण देने वाला यह हदय उसी आराधिका का है, जो पहले राधिका बनी और फिर राधिका से कृष्ण की आराध्या हो गई। कृष्ण आराधना करते हैं, इसलिए वे राधा हैं या वे कृष्ण की आराधना करती है, इसीलिए राधिका कहलाती है। सच, बहुत कठिन है इसको परिभाषित करना, क्योंकि इसकी परिभाषा स्वयं कृष्ण हैं। खुद को असाधारण होने की सीमा तक साधारण बनाए रखने वाली यह किशोरी कृष्ण को अनायास ही मिली थी भागवत में। भागवत,रस का गीत हैं। उस गीत का रस भी और कोई नहीं, यही आराधिका है। कृष्ण राधा से पूछते हंै, राधे। भागवत में क्या भूमिका होगी तुम्हारी। राधा कहती है, मुझे कोई भूमिका नहीं चाहिए कान्हा, मैं तो बस तेरी छाया बनकर रहूंगी, तेरे पीछे-पीछे । छाया हां, कृष्ण के प्रत्येक सृजन की पृष्ठभूमि में है। गोवद्र्धन को धारण करने वाली तर्जनी का बल भी यही छाया है और यही छाया है लोकहित के लिए मथुरा से द्वारिका तक की विषम यात्रा करने वाले कृष्ण की आत्मशक्ति। संपूर्ण ब्रज रंगा है कृष्ण रंग में, कदंब से लेकर कालिंदी अर्थात यमुना तक। सब ओर कृष्ण ही कृष्ण। लेकिन इस कृष्ण की आत्मा बसती है राधा में। वृंदावन की कुंज गलियां हों या मथुरा के घाट हर ओर, हर तरफ बस एक नाम, एक रट,राधा राधा राधा । बांके का बांकपन भी राधा है और योगेश्वर का ध्यान भी राधा है। कृष्ण के विराट को समेटने के लिए जिस राधा ने अपने हदय को इतना विस्तार दिया कि सारा ब्रज ही उसका हदय बन गया। उसी राधा के बारे में भागवत में गोपियां पूछती है कि यह आराधिका आखिर है कौन? पहले तो कभी दिखी नहीं। कौन है वो मानिनी, जिसकी वेणी गूंथता है उनका श्याम, जिसके पैर दबाता है सलोना घनश्याम और हां जब वो रूठ जाती है तो मोर बनकर नृत्य भी करता है ।गोपियां ही नहीं, कृष्ण भी पूछते हैं, बूझत श्याम, कौन तू गोरी । लेकिन राधा को बूझना इतना सरल नहीं और राधा को बूझ पाने से भी कठिन है- राधा के प्रेम की थाह बूझ पाना। इसी अथाह प्रेम की थाह पाने के लिए एक बार लीलाधर ने एक लीला रची। स्मृतियां कृष्ण को खींच ले गईं उत्सव के क्षणों में। हर ओर खुशी का सैलाब। हास-परिहास के बीच अचानक पीड़ा से छटपटाने लगे कृष्ण। ढोल, ढप, मंजीरे खामोश होकर मधुसूदन के मनोहारी मुख पर आती-जाती पीड़ा की रेखाओं को पढऩे लगे। चंदन का लेप शूलांतक वटी कोमलांगी स्पर्श सब व्यर्थ। वैद्य लज्जित से एक-दूसरे को निहार रहे थे। रानी सत्या ने डबडबाती आंखों से पूछा तो उत्तर मिला, मेरे किसी परम प्रिय की चरण धूलि के लेप से ही मेरी पीड़ा ठीक हो सकती है। कृष्ण की पीड़ा बढ़ती ही जा रही है। सोलह हजार रानियां-पटरानियां करोड़ों भक्त, सखा, सहोदर सब प्राण होम करके भी अपने प्रिय की पीड़ा हरने को तैयार हैं, लेकिन प्रभु के मस्तक पर अपनी चरण धूलि लगाकर नर्क का भागी कोई नहीं बनना चाहता। सबने अपने पांव पीछे खींच लिए। राधा ने सुना तो नंगे पांव भागती चली आई। आंसुओं में चरण धूलि का लेप बनाकर लगा दिया कृष्ण के भाल पर। सब हतप्रभ थे। यह कैसी आराधिका है, इसे नर्क का भी भय नहीं। कृष्ण मुस्कुरा दिए, जिसने मुझमें ही तीनों लोक पा लिए हों,वो अन्यत्र किसी स्वर्ग की कामना करें भी तो क्यों? सारे संसार को मुक्त करने वाला इसीलिए तो बंधा है इस आराधिका से। कृष्ण सबको मुक्त करते हैं, लेकिन राधा कभी मुक्त नहीं करती कृष्ण को। कृष्ण खुद भी कहां मुक्त होना चाहते हैं, ब्रज की इस गोरी के मोहपाश से। कभी-कभी रूक्मिणी छेड़ती हैं, क्या सचमुच बहुत सुंदर थी राधा? कृष्ण कहते हैं हां, बहुत सुंदर इतनी सुंदर कि उसके सामने मौन हो जाती हैं, सौंदर्य की समस्त परिभाषाएं। सूर्योपराग के समय कुरूक्षेत्र में सब उपस्थित हुए हैं । राधा भी आई है, नंद-यशोदा, गोप-ग्वाल, गोपियों के साथ। रूक्मिणी आश्चर्य में हैं । इस राधा के आते ही सारा परिवेश कैसे एकाएक नीला हो गया है। और कृष्ण का नीलवर्ण राधा के बसंत से मिलकर कैसे सावन-सावन हो उठा है। यों रूक्मिणी खुद स्वागत कर रही हैं राधा का, लेकिन कै से बावले हुए जाते हैं कृष्ण। रूक्मिणी खुद स्वागत कर रही है राधा का,लेकिन कैसे बावले हुए जाते हैं कृष्ण। एक जलन-सी उठती है मन में और यही जलन रूक्मिणी सौंप देती हैं राधा को गर्म दूध में। कृष्ण का स्मरण कर एक सांस में पी जाती हंै राधा । सारा द्वेष, सारी जलन, सारी पीड़ा, लेकिन कृष्ण नहीं झेल पाते। कृष्ण के पैर दबाते समय रूक्मिणी ने देखा कि श्री कृष्ण के पैरों में छाले हैं। मानों गर्म खौलते तेल से जल गए हों। यह क्या हुआ द्वारिकानाथ,ये फफोले कैसे? कृष्ण बोले, प्रिय राधा के हदय में बसता हूं मैं। तुम्हारे मन की जिस जलन को राधा ने चुपचाप पी लिया देखो वही मेरे तन से फूट पड़ी है। राधा को बड़भागिनी कहता है यह संसार लेकिन बड़भागी तो कृष्ण हैं, जिन्हें राधा जैसी गुरू मिली , सखी मिली, आराधिका मिली। जिसने उन्हें प्रेम, समर्पण और त्याग की वर्णाक्षरी सिखाई। तभी तो दानगढ़ में दान मांगते हैं कृष्ण । दानगढ़ जो बसा है सांकरी खोर और विलासगढ़ से विपरीत दिशा में। यहां राधा के चरणों में झुककर याचक हो जाते हैं कृष्ण । हे राधे बड़ी दानी है तू, सुना है तेरे बरसाने में जो भी आता है, वो खाली हाथ नहीं जाता। मुझे भी दान दे। प्रथम दान अपनी रूप माधुरी का। दूसरा दान तेरे अनंत रस और विलास का। दानगढ़ में कृष्ण को दिया गया, ये महादान ही पाथेय बन जाता है कृष्ण का, गैया चराने वाले गोपाल से द्वारिकाधीश बनने तक की लंबी यात्रा में। कुरूक्षेत्र से लेकर प्रभास तक राधा का यही प्रेम तो जीवन रसधार बनकर बहता रहा कृष्ण के भीतर। गीता का आधार भी यही प्रेम है औेर महारास का रस भी। वेणु हो या पांचजन्य, दोनों में एक ही स्वर फूटता है। एक ही पुकार उठती है, राधे तेरे नैना बिंधो री बान । कृष्ण से जुड़ी हर स्त्री राधा होना चाहती है। स्वयं कृष्ण भी राधा हो जाना चाहते हैं। लेकिन कृष्ण जानते हैं कि राधा का पर्याय केवल राधा ही हो सकती है, इसीलिए तो कृष्ण बार-बार आना चाहते हैं राधा की शरण में। आंखों में एक चमक-सी कौंधती है। दूर कालिंदी की लहरों पर एकांत पथिक-सा नि:शब्द बढ़ रहा है राधा की मन्नतों का एक दीया। कृष्ण मौन सुन रहे हैं, डूबती द्वारिका के अंधेरों से निकलती अर्थहीन आवाजें और उन आवाजों में घुलता एक सवाल, जा रहे हो कान्हा ,पर क्या सचमुच अकेले जा सकोगे? अगले अंक के कालम के लिए वास्तव में तो यह भूमिका स्वरूप ही है। क्योंकि वल्लभाचार्य जी को 500 साल पहले ठाकुर जी ने अर्थात श्रीकृष्ण ने स्वयं सामने आकर भक्ति,प्रेम, व समर्पण का जो ज्ञान दिया था और जो सिद्धांत रहस्य ग्रंथ में समाहित हैं व जिसे गोस्वामी जी कमलेश जी ने तीन दिनों में समझाया,उसे समझने के लिए यह भूमिका आवश्यक हेैं।


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