Monday, 21 August 2017

प्रसंग-वश- चंद्रकांत अग्रवाल                                                                 आज के दौर में तो श्रीकृष्ण ही सार्थक जीवन के नायक हो सकते हैं?
देश भक्ति व देश प्रेम से पुन: अब तीसरी कड़ी में हम अपने श्रीकृष्ण प्रेम पर आते हैं। सोमवार 21 अगस्त 2017 से ही पत्रकार से चिंतक व फिर भागवत कथाकार बनकर देश भर में लोकप्रिय पंडित विजयशंकर मेहता ने शहर की फिजाओं में श्रीमदभागवत कथा ज्ञान गंगा का संवाहन प्रारंभ किया। प्रथम दिवस उन्होनेंं सार्थक जीवन जीने की कला व  मृत्यु भय से मुक्ति की बात करते हुए जीवन में परिश्रम,पारदर्शिता,प्रेम,व पवित्रता के चार अमृत तत्वों को रेखांकित किया। आज के हमारे कालम का विषय भी  इसी चिंतन से जुड़ा हैं।  कुछ बड़े संत ऐसा कहते हैं कि श्रीराम का चरित्र अनुकरणीय है पर श्रीकृ ष्ण का चरित्र सिर्फ चिन्तन करने के लिए ही होना चाहिए हम सांसारिक लोगों के लिए। हालांकि संसार के लोग श्रीकृष्ण चरित्र का अनुसरण करने में ही सुविधा व सुख महसूस करते हैं। पिछले कुछ दिनों तक मैंने बहुत सोचा। अचानक चण्डीदत्त शुक्ल व कैलाश वाजपेयी जैसे धुरंधर साहित्यकारों का श्रीकृष्ण पर चिन्तन भी पढऩे को मिल गया, श्रीकृष्ण कृपा से ही। तब मुझे लगा कि पहले हम श्रीकृष्ण को तो पूरी तरह समझें अन्यथा श्रीकृष्ण की माया लीला,रास लीला की घटनाओं का मर्म ही समझ नहीं पाएंगे कभी और मृत्युपर्यन्त श्रीकृष्ण चरित्र का मूर्खता पूर्ण अनुसरण करते हुए अपने जीवन को भक्ति  मार्ग पर चलकर भी निरर्थक कर देंगे। तो आइए श्रीकृष्ण चरित्र का अनुसरण करने के पूर्व, उस संदर्भ में सोचने के भी  पहले हम यह तो समझ लें कि श्रीकृष्ण वास्तव में हैं क्या? कृष्ण दरअसल संपूर्णता का नाम हैं। कृष्ण मनुष्य हैं। देवता स्पष्ट हैं। योगिराज हैं। गृहस्थ हैं। संत हैं। योद्धा हैं। चिंतक हैं। संन्यासी हैं। लिप्त हैं। शिशु हैं तो संकट में हैं। किशोर हैं तो युद्ध कर रहे हैं। युवा हैं तो महाभारत की दिशा तय कर रहे हैं। देव होने के बावजूद चमत्कार नहीं करते । सच तो यह है कि कृष्ण केवल कर्म करते हैं। कर्म पर ही विश्वास करते हैं और इसी की सीख देेते हैं। जिंदगी की मुकम्मल परिभाषा समझने के लिए कृ ष्ण भाव को परखने और उसमें अंतर्निहित संदेश को कार्य-व्यवहार में उतारने की बेहद जरूरत हैं। एक शिशु ,जिसके जन्म से पहले उसकी हत्या की बिसात बिछाई जा चुकी हैं। जन्म लेने के तुरंत बाद उसे जैविक माता-पिता से दूर कर दिया गया। पलना-बढऩा एक ऐसे घर में, जहां कोई रक्त -संबंध नहीं हैं। बचपन में ही कितनी ही साजिशों से जूझना पड़ा । एक तरह से कृष्ण की पूरी शख्सियत सत्ताओं से युद्ध करते हुए ही सुदृढ़ होती हैं। जिस तरह कि हमारे देश में 1857 से लेकर 1947 तक आजादी जंग चली थी। श्रीकृष्ण के लिए भी कंस से लड़ाई इतनी आसान नहीं थी। पहले उसके भेजे दुष्ट आक्रमणकारियों से युद्ध, फिर इंद्र की सत्ता को चुनौती और अंतत: कंस का संहार।  कृष्ण के पूरे व्यक्तित्व की एक खास बात को हम बार-बार देखते हैं, वह यह है कि वे माया -मोह के बंधनों से अलग हैं। कंस उनका संबंधी था और महाभारत के समय कौरव -पांडव, दोनों निकट के रिश्ते के, लेकिन कृष्ण यह जानते हैं कि धर्म की रक्षा करने के लिए संबंधों के जाल में फंसने की जगह कर्तव्य की पुकार सुनना आवश्यक हैं। अगर इसी तथ्य को अपने जीवन में उतारना हो तो संदेश स्पष्ट हैं- किसी भी गलत बात को स्वीकार न करें। भले ही वह बात,आदेश या नीति बड़ी से बड़ी सत्ता की और से क्यों न आई हो। दूसरा संदेश यह है कि अपने कर्तव्य के आड़े कितना ही निकट का व्यक्ति क्यों न हो-उसे राह का रोड़ा न बनने दें। यहां व्यक्ति का मतलब दूसरे का होना ही आवश्यक नहीं हैं। यदि अपने मन का अहंकार भी अच्छे काम में बाधा बन रहा हो तो उसका भी शमन किया जाना चाहिए। कृष्ण का नेतृत्व ,उनके अंदर निहित संतुलन की शक्ति को ही दरअसल रेखांकित करता हैं। हम योगी, भोक्ता ,नेता, सेनानी ,विद्वान,चिंतक और निर्णायक होने के गुण अगर व्यक्तित्व में समाहित कर पाएं तो न सिर्फ संसार को जी सकेंगें, बल्कि जीवन के होने का मतलब भी बूझ सकेंगें। कृष्ण के बारे में सोचें तो ऐसे शिशु के बारे में सोचें ,जिसके जन्म लेने से पूर्व ही सत्ता उसकी हत्या कर डालने का दृढ़ संकल्प किए, व्यग्र है कि कब जन्म हो और कब उसका वध-संहार पूरा किया जाए। कृष्ण के बारे में सोचें तो ऐसे नवजात के बारे में सोचें, जिसे धरती छूते ही उसकी मां से विलग कर दिया गया। पूरी पृथ्वी पर पसरे पड़े सारे के सारे मिथक,सारा इतिहास , सभी लोक गाथाएं खंगाल लें-कहां मिलेगा आपको कृष्ण-सा जन्मजात आउटसाइडर। गर्भ के अंधकार से यूं बाहर फेंके गए हम सभी रोए हैं, मगर शायद ही कोई होगा-ऐसा लडख़ड़ा कर चलने वाला बच्चा, जिसे सुनना पड़ा हो यह ताना कि वह गोरा नहीं काला हैं। यशोदा उसकी मां नहीं, उसने तो बस उसे पाला हैं। दुधमुंही उम्र और इतना विषाक्त आसपास ? कोई और होता तो कच्ची उम्र में ही न्यूरॉटिक हो जाता या क्या पता कि आज के किशोरों की तरह गोकुल में नंदमहल की खिड़की से यमुना में छलांग लगा लेता। कृष्ण ने वह सब नहीं किया। आयु बढऩे के साथ-साथ,ग्वाल-बालों के साथ गोचारण और ब्रज की धरती पर तरह-तरह के खिलवाड़ । यहां तक कि इंद्रपूजा का विरोध भी कर डाला। कृष्ण ही थे, जिन्होंने कहा कि वर्षा तो अपने आप आती हैं, इंद्र की अभ्यर्थना का अर्थ क्या? कृष्ण ने इतनी कम उम्र में साहसिक कदम उठाया और पल भर में सारा प्रसाद हठ करके वन और पर्वत में रहने वालों को बांट दिया। वर्षा जब धारासार होने लगी तो ब्रजवासियों को गोवद्र्धन पर्वत के नीचे शरण दी। श्रीकृष्ण चरित्र का निहितार्थ समझें। इंद्रियों का अर्थ होता हैं गो। एक बार पहाड़ उठा ले कोई, डूबने से बचा ले अपनों को तो समझिए कि इंद्रियां सध गई। अब उनके साथ काल के प्रवाह में बहने की जगह उन्हें ऊध्र्वमुखी करने को राम कहा जाएगा। यह चेतना का रहसीला तल हैं। एक बार स्वाद पा लेने के बाद रस का, एक-एक गोपी के वास्ते ,कृष्ण व्यसन हो गए। यमुना की रेत कृष्ण , मोर की तान में,चारे में कृष्ण, दधि मथानी में, रोटी में कृष्ण,साग-भाजी में कृष्ण,चूल्हे की आग,राख,धड़कन,कलेवा, कदंब के पात-पात में कृष्ण। सांस, नींद,आंगन, दालान, द्वार, वीथिका, करील फूल, गूदड़ी, गोधूलि, फटी साड़ी, गागर, जगत में कुए के छलके पानी में। अपने प्रतिबिंब थके अंग,घने बादल, बौछार, उड़ी मिट्टी की गंध, हर एक रंग में इंद्रधनुष के, कहां-कहां कृष्ण नहीं दीख पड़ते थें।  ऐसा होना हो जाए किसी को शायद तभी आभास हो सकता है रास लीला का। कृष्ण को जब मथुरा जाना पड़ा, तब से लेकर आगे का जीवन तो ओर भी त्रासद हैं। जरासंध हमला कर देता है। कालयवन से प्राण बचाने के लिए भागना पड़ता हैं। यही नहीं , भिक्षा मांग खाना भी पड़ता हैं। प्रवर्षण पर्वत पर दावानल घेर लेता हैं। नंगे पांव भागना अनिवार्य हो जाता हैं। सत्यभामा के पिता के घर डाका पड़ता हैं। द्वारिका पर आकाश मार्ग से हमला होता हैं। घरेलू वातावरण का हाल यह कि बलराम भी विश्वास नहीं करते। बेटा कहना नहीं मानता। हारकर स्वयं कृष्ण ने अपनों का वध किया और अंत में यह कि प्रभास क्षेत्र में जब उनके पांव में जराव्याध का बाण लगा तो वहां भी कृष्ण यही समझाते हैं। भू और ख कोरे अक्षर नहीं-भूमंडल से लेकर खगोल तक सब तरफ भूख का पसारा हैं। बेकार है पश्चाताप, जराव्याध। सब कुछ यहां सब कुछ का आहार हैं। कृष्ण आगे कहते हैं-सीधी बड़ी साफ हैं-परिभाषा पाप की। आज के संदर्भ में इसे ही भ्रष्टाचार कहते हैं। नीति समझ में आ जाए नैतिकता,जैसा सिक्का, दूसरा पासा उस सिक्के का-ऐसा कुछ होता हैं पाप या भ्रष्टाचार । भाग रही दुनिया मनोरथ की मारी। झर रहा झरना मनोरथ का। नदी के तो होते हैं फिर भी किनारे, मनोरथ का निर्झर पर तट विहीन हैं। देह छोडऩे से पूर्व श्रीकृष्ण ने जराव्याध को क्षमा कर दिया।   जराव्याध, भ्रमवश अपने द्वारा किए गए शर संधान पर पश्चाताप करता हुआ केशव  की शरण में आया था। शरणागति हमेशा सुरक्षा के लिए, सहायता के लिए होती हैं। श्रीकृष्ण ने व्याध को क्षमा के ही साथ, स्वर्ग सुख का वरदान भी दिया, इसलिए श्रीकृष्ण को प्रसन्न पारिजात भी कहा गया हैं। श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व को परिभाषा में बांध पाना असंभव हैं। उनका चरित्र सौ पंखुरियों वाले कमल जैसा हैं। सभी अध्येता ऐसा मानते हैं कि पूर्ण संपूर्णता, उनका विराट दिव्य तत्व कुरूक्षेत्र के मैदान में ही पूरी तरह खिलता हैं। जहां उन्होंने अर्जुन के रथ का सारथी होना स्वीकार किया। सारयति अश्वान् इति सारथि:। जो हमारे जीवन का संचालन करे,उसका नाम सारथी हैं। दुर्योधन अहंग्रस्त और स्वार्थी हैं, इसीलिए उसका सारथी अज्ञातनामा हैं, जबकिअर्जुन समर्पित योद्धा हैं, कृष्णार्पित। हालांकि वह अब भी द्विधाग्रस्त है। ऊहापोह में है। अपने यहां। एक मान्यता हैं: कलि:शयानो भवति-जो सो गया, वह कलियुग हो गया। संजिहानस्तु द्वापर:-जो करवट बदलें,द्विधा में हो, वह द्वापर हैं। उत्तिष्ठन् त्रेता भवति:-जो उठ बैठा,वह त्रेता हैं। कृतं संपद्यते चरन: अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जो आगे बढ़ चला जो, वह सतयुग हो गया। सोचिए, श्रीकृष्ण न हुए होते तो ललित कलाओं का क्या होता। इतिहास साक्षी है कि हर कला की धुरी श्रीकृष्ण पर टिकी है। श्रीकृष्ण रसेश्वर भी हैं और योगेश्वर भी। कृष्ण ढेरों विरोधों का संगम हैं- नर्तक-योद्धा, संन्यासी-सम्राट, निष्कपट-छलिया,अजातशत्रु-मित्र,चोर-साधु और निर्मोही -प्रेमी। कृष्ण सभी का युग्म हैं। हम सब कृष्ण की गिरफ्त  में हैं। ये जो कृष्ण में भासमान चौंसठ कलाएं हैं , खोजने पर हम सब में भी चार - छ कलाएं मिल ही जाएंगी तो भी कहां दिव्य पुरूष कृष्ण और कहां हम। तो ऐसी अलौकिक पीड़ाएं भोगी हैं मेरे श्रीकृष्ण ने। इतना पढऩे समझने के बाद भी यदि किसी भक्त का श्रीकृष्ण के चरणों में प्रेम न जगे, समर्पण न हो पाए तो उससे ज्यादा दुष्ट और कौन होगा? मेरे श्रीकृष्ण से कुछ मांगने से पहले अब दस बार सोचना। और मांगना भी हो तो उसके पहले उससे सच्चा प्रेम करना होगा व तबश्रीकृष्ण की कृपा के लिए प्रार्थना करने के योग्य समझना अपने आपको। श्री कृष्ण का जीवन चरित्र देखकर ही शायद मां कुंती ने उनसे दुखों का वरदान मांगा था ताकि वे अपने श्री कृष्ण को सदैव अपने पास रख सकें । प्राय:लाखों करोड़ों भक्तों का पूरा जीवन अपने को श्री क ृष्ण की कृ पा हेतु प्रार्थना करने के योग्य बनाने में ही खत्म हो जाता है पर वे ....।
श्रीराम की मर्यादा को तो कोई अपने जीवन में आत्मसात ही नही कर पाता पूरी तरह से। गोलियों से छलनी राष्ट्रपिता बापू के अंतिम शब्द थे-हे राम । इतना संयमित व समर्पित जीवन जीते हुए भी श्री राम की मर्यादा को आत्मसात करने के तुरंत बाद ही वे चले गए। इसके पहले  कि उनके जीवन में श्री कृष्ण कृपा का प्रवेश हो पाता वे,चले गए, अनंत की एक अलौकिक यात्रा पर। पर मैं सोचता हँू कि यदि वे नहीं जाते 10-15 साल और जी पाते तो देश के काले अंग्रेजों को देश से बाहर का रास्ता दिखाने में उन्हें श्री कृष्ण की चौंसठ कलाओं में से 3-4 कलाओं का आश्रय लेना ही पड़ता। सत्याग्रह का मार्ग छोड़कर श्री कृष्ण के मार्ग की तरह ही अपनों पर ही वार करने के लिए विवश होना पड़ता। एक और महाभारत युद्ध लडऩा ही पड़ता। जिस तरह श्री कृष्ण लड़े थे। भले ही शस्त्र के बिना लड़ते। वे अभिमन्यु बनते या अर्जुन यह तो नही जानता पर इतना जरूर जानता हँू कि आज के भारत का वर्तमान इतना त्रासदीपूर्ण,नही होता। जनलोकपाल के लिए किसी अन्ना को आमरण भूख हड़ताल न करनी पड़ती। काले अंग्रेजों की संख्या राजनीति व जीवन के अन्य क्षेत्रों में इतनी बड़ी न होती, जितनी आज हैं। इतने सारे दु:शासन व दुर्र्याेधन इस तरह निर्बाध रूप से देश में नहीं घूम रहे होते। अगले अंक में हम पुन: श्रीकृष्ण के चरित्र के ही कुछ और मर्म समझेंगे व फिर समझेंगे श्रीराम का चरित्र । जय श्रीकृष्ण। जय श्रीराम।

Saturday, 12 August 2017


प्रसंग- वश -चंद्रकांत अग्रवाल

सिर्फ प्रेम व भक्ति से ही पा सकते हैं हम श्री कृष्ण की अलौकिक कृपा भी

पिछले कॉलम में हमने चर्चा की थी कि किस तरह अपने लौकिक व भौतिक वैभव व सुखों का त्याग किये बिना सिर्फ अपने सर्वस्व के पूर्ण समर्पण से हम श्रीकृष्ण के परमप्रिय बन सकते हेैं। महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी के कुल दीपक व पुष्टिमार्गीय पंथ प्रवर्तक गोस्वामी श्री कमलेश जी मुंबई के श्री मुख से पहली बार मैनें भगवान शब्द की ऐसी व्याख्या सुनी व समझी जो अब तक कहीं भी ना तो सुनी थी, ना ही किसी ग्रंथ में पढ़ी थी। गोस्वामी जी ने भगवान को परिभाषित करते हुए कहा कि जो भक्त के भाव के अनुरूप स्वरूप में दर्शन देकर वैसी ही कृपा करें,वहीं भगवान हुआ। श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में भी इसी तरह अपने से जुड़े व प्रेम करने वालों पर अपनी कृपा बरसायी थी। कंस की महासभा में वे कंस क ो काल रूप में,पहलवानों को एक मल्ल के रूप में, अपने साथ आये ग्वालों को सखा रूप में तो स्त्रियों को कामदेव के रूप में दर्शन देेते हैं। श्रीकृष्ण भक्ति में वास्तव में भाव समर्पण ही निर्णायक होता हैं। अब यदि आज के दौर के भक्तों की पीड़ा की बात करें तो मुझे नर्मदांचल के शुकदेव स्वरूप संत कमलकिशोर नागर जी का सत्संग याद आ जाता हैं। वे मानते हैं कि हम पर श्रीकृष्ण कृपा इसलिए नही होती,क्योंकि हम प्राय: सदैव श्रीकृष्ण से कुछ न कुछ सांसारिक सुख ही मांगते हैं। हम कभी भी श्री कृष्ण से उनके प्रेम के लिए, उनकी कृपा दृष्टि के लिए, उनकी भक्ति के लिए कोई प्रार्थना नही करते। अब जहां तक सांसारिक सुखों का सवाल हैं,वह तो हमारे प्रारब्ध पर निर्भर होते हैं। इस जन्म में हमारे अच्छे कर्मों का प्रतिफल भी यदि हमेें दुखों के रूप मेंं मिल रहा है तो यह हमारा जटिल प्रारब्ध ही है जिसे हमें भोगना ही पड़ेगा पर हां यदि हम अपने प्रभु से उनकी कृपा दृष्टि, उनक ा प्रेम व उनकी भक्ति सच्चे दिल से मांग लें तो जटिल से जटिल प्रारब्ध भी बहुत सरलता से भोगने में सफल होते हैं। इसी तरह यदि इस जन्म में हमारे बुरे से बुरे कर्माे क ा प्रतिफल भी यदि हमें संासारिक सुखों के रूप में ,धन-वैभव के रूप में मिल रहा है तो यह भी हमारे अच्छे प्रारब्ध का ही परिणाम होता हैं। यह अलग बात हैं कि बुरे कर्म करने वाले ऐसा नही मानते बल्कि यह मानते हैं कि यह सब सुख उनको उनकी चालाकी से मिले हैं । प्रारब्ध को ही भाग्य भी कहा जाता है। पर यह सब कहते हुए भी नागरजी हमें भाग्यवादी नही बनने की सीख बार-बार देते हंै क्योंकि वे ऐसा मानते हैं कि सिर्फ मनुष्य योनि ही ऐसी योनि है जिसमें प्रारब्ध को बदलने व प्रभु भक्ति व शुभ कर्मो से बड़े से बड़े कष्ट को छोटे से छोटा कर देने की आत्मशक्ति होती है। जरूरत सिर्फ इस आत्मशक्ति को जगाने की है। आज भी यदि गोपी भाव की कातरता के साथ कोई भक्त श्रीकृष्ण को याद करता है तो प्रभु अवश्य आते हैं। उन्होंने गोपियों को वृंदावन के निधि वन में महारास के साथ उनके प्रेम क ो व उन्हें सदा के लिए अमर कर दिया। अध्यात्म व रूहानी प्रेम का यह इंद्रधनुष आज भी वृंदावन के निधि वन में हर रात बनता हैं। पर कोई देख नही पाया। जिसने देख लिया वह फिर किसी को भी कुछ भी बताने लायक या स्वयं कुछ भी देखने लायक ही नहीं बचा। उसे संसार से भी जाना पड़ा । ऐसी मान्यता आज भी पूरे ब्रज मंडल में मानी जाती हैं। कहते हैं कि प्रतिदिन रात्रिकाल में निधि वन मेंं रहने वाले सैंकड़ों बंदर भी चमत्कारिक रूप से निधि वन से बाहर आ जाते हैं। निधिवन में गोपियां वृक्षोंं की लताएं बनकर दिन में भी नजर आती हैं पर उनकों स्पर्श करने में भी दोष माना जाता है। निधि वन की मिट्टी में विलीन हो जाने की चाहत रहती है हर कृष्ण भक्त में । मैं जब भी वृंदावन गया पाया कि श्री गिरिराज जी,यमुना जी और निधि वन आज भी श्री कृष्ण काल के जीवंंत साक्षी हैं । जरूरत सिर्फ इस सच को महसूस करने की हैं । प्रभु कृपा और भक्ति के बिना तो इनके दर्शन करना भी संभव नही हैं। श्री कृष्ण के विछोह में गोपियों की सी तड़प को महसूस कर पाने की सामथ्र्य आज कितने श्रीकृष्ण भक्तों में हैं। अपने भीतर प्रभु से मिलने की यह तड़प जगाने के लिए नागर जी भी वास्तव में श्रीमद भागवत सप्ताह के अपने प्रवचनों में मुख्यत: यही प्रयास करते दिखते हैं। वे कहते हैं कि सती बनों तो सावित्री की तरह,पतिव्रता बनों तो अनुसुइया की तरह,ब्राह्मण बनों तो नरसिंह मेहता की तरह, तपस्या करो तो भागीरथ की तरह, लगन लगाओ तो मीरा की तरह, प्रेम करो तो गोपियों की तरह,कवि बनो तो कालीदास की तरह, दृढ़ता रखो तो धु्रव की तरह,स्वाभिमानी बनो तो महाराणा प्रताप की तरह,श्रोता बनो तो परीक्षित की तरह ,भक्त बनो तो प्रहलाद की तरह, पुत्र बनो तो श्रवण की तरह,दास बनो तो हनुमान की तरह,भाई बनो तो भरत की तरह। पंचांग में प्रदोष तो सभी लोग देखते हैं। अपने दोष देख लो, बस वही सच्चा पंचांग है। यदि आपके अंदर सदगुण है तो रूप की क्या जरूरत है । आज के युग मेेे महापौर बनने का प्रयास तो कई करते हैं पर महापुरूष बनने की बात तक कोई नही सोचता । जनता सरकार बना सकती है,संत नहीं। सरकार बनाई जाती है पर संत बनाया नही जाता । सुंदर कांड करने की समिति आज भी हर गांव में नहीं है। पर लंका कांड करने की समिति तो हर घर में हैं। नागर जी द्वारा व्यक्त की गई कुछ खरी -खरी बातों का एक सुंदर संग्रह उनकी एक किताब शीर्षक शब्दों के छप्पन भोग में दर्ज है। नागर जी कहते हंै कि भुगत शब्द से ही भगत शब्द बना है। दुख भोग कर ही भगत बना जाता है। सच्चे भक्त की संसार में जितनी बिगड़ती है,उतनी ही भगवान के यहां बनती है। आजकल लोग रावण की लंबाई तो जरूर नापते हैं,पर अपने कु कर्मों की लंबाई कोई नही नापता। कच्चे भगत भी कच्ची शराब की तरह होते हैं, जिनमें से केवल अभिमान की दुर्गंंध ही आती हैं। पश्चिम दुनिया की संस्कृति क ी और मत भागो क्योंकि पश्चिम सदा अस्त करने का काम ही करता है। सूर्य भी जब पश्चिम की और जाता है तो अस्त हो जाता है। अत: यदि हम पाश्चात्य संस्कृति की और जाएंगे तो हमारा सार्थक जीवन भी अस्त हो जाएगा । नागर जी धूर्त नेताओं पर बड़े करारे कटाक्ष करते हैं- वे पूछते हैं कि नोट लेकर जो फिर नजर नही आए वह चोर कहलाता है । पर वोट लेकर जो नजर नही आए उसे क्या कहना चाहिए? जिस तरह संसार का चिंतन करने से ब्लड प्रेशर बढ़ता है,उसी तरह भगवान का चिंतन करने से भक्ति बढ़ती हैं। कपड़े तो चूहे भी काटता है व टेलर भी। पर तुम अपना जीवन चूहों की तरह मत काटो। भजन करने से तो राक्षस की संतान भी देवता बन जाती है,जैसे कि प्रहलाद चरित्र । इसी तरह भजन नही करने से ब्राह्मण की संतान भी राक्षस बन जाती है,जैसे कि रावण चरित्र। विभीषण ने कहा कि वे रावण के राज्य में रहकर भी नही बिगडें़ेगे तो कैकई ने कहा कि हम राम के राज्य में रहकर भी नही सुधरेंगे। मंत्री,अधिकारी से संपर्क बनाने व साधने की एक अंधी दौड़ मची हुई है आजकल। पर ऐसी दौड़ भगवान के लिए हम नही लगा पाते जबकि मरकर तो हमें भगवान के यहां ही जाना है, किसी मंत्री या अधिकारी के घर नही ं। पशु-पक्षी भी एक सीमा तक सिद्धांतवादी होतेे हैं पर मानव अब वैसा नही रहा। अपने घरों में कुत्ता पालकर हम चिल्लाना तो सीख गए पर बफादारी नही सीख पाए। जिस तरह लोहे पर रंग लगा देने से उसमें जंग नही लगती,उसी तरह मनुष्य पर यदि भक्ति का रंग चढ़ जाए तो उसे फिर वासना की जंग नही लगती। चाहे जितना धन वैभव आ जाए पर भक्ति के बिना यह वैसा ही है जैसे कि किसी सुंदर नारी की नाक कट जाए। रविवार को फ्रें डशिप डे सबने मनाया और इस दिन के भारतीय आदर्श श्रीकृष्ण व सुदामा बनकर सोशल मीडिया सहित हर जगह छाए रहे। मुझे पुन: डाक्टर माधवी पटेल के सत्संग सत्र की स्मृतियां ताजा हो गयीं। हालांकि उन्होनें श्रीकृष्ण सुदामा चरित्र समयाभाव के कारण बहुत संक्षेप में अभिव्यक्त किया। पर मेरी इच्छा हो रही हैं। कि फ्रेें डशिप डे को सार्थक बनाने हेतु मैं भी अपना चिंतन आज के इस कॉलम में जोडूं । श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता भौतिक व आध्यत्मिक दोनों दृष्टियों से अद्वितीय थी, अद्भुत थी , बेमिसाल थी। क्योंकि उनमें एक दूसरे के प्रति सिर्फ अनंत प्रेम था, अनंत समर्पण था। कहावत हैं कि मित्रता बराबरी वालों से करनी चाहिए। आज के इस अर्थ प्रधान दौर में जब पैसा ही भगवान मानें जाना लगा है , इस कहावत का विकृत अर्थ यह लगाया जाता हैं कि आर्थिक रूप से जो आपकी बराबरी का हो, उसी से मित्रता करें। पर वास्तव में श्रीकृष्ण का संदेश यही हैं कि बराबरी से तात्पर्य गुणों से,चरित्र से हैं। बल्कि उससे भी आगे बढ़कर वे तो श्री सुदामा चरित्र के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि बराबरी वाले से नहीं बल्कि गुणों व चरित्र में अपने से श्रेष्ठ से ही मित्रता करनी चाहिए। ताकि वो आपके व्यक्तित्व व कृतित्व को अधिकाधिक तेजस्वी, प्रखर,ऊर्जावान व सार्थक बना सकें। तभी आपका मित्रता करना भी सार्थक होगा अन्यथा आप अपने आपको ही धोखा दे रहें होंगें। राजा परीक्षित द्वारा अपनी मृत्यु के दिन श्री शुकदेव जी से पूछे गये प्रश्न जीवन के उत्तरार्ध की तेैयारी कै सें करें एवं रूकमणी विवाह के प्रसंग का आध्यत्मिक संदेश सुनाते हुए कुछ समय पूर्व हवेली मंदिर के मुखिया जी हरिकृष्ण जी ने इटारसी की ही धरा पर बहुत अद्वितीय चिंतन किया था। वे बोले थे कि दशम स्कंध में प्रसंग आता हैं कि जीवात्मा को अपने जीवन के उत्तरार्ध में ऐसी आध्यत्मिक तैयारी कर लेनी चाहिए कि उसकी आत्मा को लेने श्री कृष्ण स्वयं रथ लेकर आयें, जिस तरह वे ,राजा परीक्षित को लेने आये थे,रूकमणि जी को लेने आये थे व जिस तरह उन्होंनें 16 हजार 108 कन्याओं को कारागार से मुक्त करा उनसे एक साथ एक अद़भुत व अलौकिक विवाह कर उन्हें अपना बनाया था। सुदामा चरित्र का प्रसंग मुखिया जी ने जीवन दर्शन के कई कोणों से बड़ी प्रखरता व जीवंतता के साथ सुनाया था। सुदामदेव एक ऐसे ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण थे जिनके रोम रोम में श्रीकृष्ण बसे थे। उन्होंनें न तो कभी अपनी ब्राह्मण जाति व अपनी विद्वता को अपने व परिवार के पेट भरने का जरिया बनाया,न ही अपने मित्र द्वारिकाधीश से ही कभी कोई सहयोग लिया। उनकी विद्वता, उनके आराध्य की भक्ति का एक स्त्रोत मात्र थी, उनकी विद्वता में जो निजता थी वह बेमिसाल ही थी। अन्यथा वे किसी भी बड़े से बड़े गुरूकुल से जुड़कर सुखमय जीवन जी सकते थे। पर उनकी भक्ति ही उनकाअसल सुख थी। फिर उनकी पत्नी सुशीला भी नाम के अनुरूप पति के आदर्शों पर चलने वाली अत्यंत धैर्यवान थी। पत्नी को ऐसा ही होना भी चाहिए। सुदामदेव का प्रण था कि कभी भी किसी से कुछ भी मांगूंगा नही। यदि कोई यजमान साल भर का अनाज देना भी चाहता तो सुदामदेव मना कर देते। संग्रह की वृत्ति उन्हें कदापि स्वीकार नहीं थी। सुशीला जी से जब अपने बच्चों की भूख बर्दाश्त नहीं हुई तो उन्होंंंनें सुदामदेव से अनुरोध कियाआप अपने मित्र द्वारिकाधीश से एक बार मिल तोआओ। मैं कुछ मांगने नहीं भेज रही बल्कि दर्शन करने भेज रहीं हँू। साथ में एक पत्र भी दिया, जिसमें अत्यंत मर्यादा व स्वाभिमान के साथ लिखा कि हे द्वारिकाधीश, माह में दो एकादशी आती हंै जिन पर व्रत करना चाहिए पर मेरा पूरा परिवार तो प्रतिदिन ही एकादशी कर रहा हैं। पढ़कर द्वारिकाधीश रो पड़े व कहने लगे कि मेरा दीनानाथ कहलानाआज झूठ हो गया। उन्होंने पूर्व दिशा में खड़े सुदामदेव को बिदा करते हुए तिलक करना चाहा तो देखा कि उनके भाल पर लिखा था,श्री क्षय। इसे पलटकर उन्होंनें यक्षश्री कर दिया व पूर्व दिशा के मालिक इंद्र को हंसते देखा तो इंद्र का वैभव भी सुदामा के परिवार को उसी क्षण दे डाला। पर अपने मित्र को पहनाए पीतांबर को भी उतारने को कह अपनी फटी पुरानी घोती ही पहनने को कहा। इस प्रसंग के गहरे संदेश है। श्रीकृष्ण नहीं चाहते थे कि दुनिया यह कहे कि कभी किसी से कुछ नहीं मांगने का प्रण करने वाले उनके मित्र सुदामा द्वारिकाधीश के महल से एक पीताम्बर पहनकर भी कैसे निकलें? श्रीकृष्ण को सुदामा की खुद्दारी की रक्षा की ज्यादा चिंता हेैं। पर वे सुशीलाजी द्वारा दी गयी चिवड़े या पोहे की पोटली जो सिर्फ उनके लिए दी गयी थी,सुदामा से छीनकर खा जाते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते कि एक बार फिर सुदामा उनके हिस्से का अन्न खाकर पाप के भागी बनें जैेसे कि गुरूकुल में रहते हुए, जंगल में खाने हेतु गुरू माता द्वारा लिए दिये गये उनके हिस्से के चने भी सुदामा खा गये थे औेर भीषण दरिद्रता भोगी। हालांकि आज के दौर मेेंं भगवान के हिस्से का व उनके नाम का ,भगवान के मंदिरों के हिस्से का देश भर में कौेन, कितना, कैसे खा रहा हैं,सब जानते हैं। कलयुग में उनको सुदामा की तरह दरिद्रता का फल नहीं मिल रहा हंै। उल्टे वे उत्तरोत्तर वैभवशाली हो रहें है। कदाचित इसीलिए कि इस जन्म में तो जोभी सुख हमें मिलेगा,अपने पूर्व जन्म के प्रारब्ध से ही मिलेगा। ऐसा कहा जाता हैं कि श्रीमदभागवत के विभिन्न प्रसंगों के प्रतिश्रुति फल केअनुसार सुदामा चरित्र का प्रतिश्रुति फल यह होता हैं कि इसे प्रेम से सुनने व कहने वाला बड़े से बड़े सुख में भी अपने आराध्य को,अपने भगवान को कभी नहीं भूलता। यह बहुत बड़ा फल हेैं क्योंकि जीवात्मा प्राय: यहीं तो धोखा खा जाता हैं और इस कारण उसके जीवन का उत्तरार्ध बिगड़ जाता हैं। अंतिम यात्रा की तैयारी होने पर भी उसे यह भान नहीं रहता कि उसे किस तरह व किसके सांथ कहा जाना हैं, नये सफर पर। अगले अंकों की कडिय़ों में हम पुन: गोस्वामी जी द्वारा अभिव्यक्त व महाप्रभु जी द्वारा रचित सिद्धांत रहस्य का चिंतन करने अथवा पुन: उसकी भूमिका को ही आगे बढ़ायेंगे, मैं स्वयं नहीं जानता क्योंकि श्रीकृष्ण जैसी प्रेरणा देंगे वैसी ही चलेगी मेरी कलम,वैसे भी इस चिंतन के भाव भी श्रीकृष्ण की कृपा से ही गतिमान हैं। जय श्री कृष्ण।

Monday, 31 July 2017


 

 

 

 

 

प्रसंग-वश- चंद्रकांत अग्रवाल                                            

सिर्फ और सिर्फ अपने सर्वस्व का पूर्ण समर्पण ही हमें श्रीकृष्ण का परमप्रिय बना सकता है

विगत शनिवार तक अविराम तीन दिनों तक श्रीद्वारिकाधीश मंदिर सत्संग भवन में कलयुग में 500 वर्ष पूर्व के कालखंड के योगेश्वर श्रीकृष्ण के परमप्रिय व सर्वाधिक कृपापात्र महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी के कुल के एक दीपक  व पुष्टिमार्गीय श्रीकृष्ण भक्ति पंथ के परम ज्ञानी श्री गोस्वामी जी कमलेश जी कांदीबली मुंबई द्वारा ब्रह्म संबंध, भगवान शब्द का अलौकिक भावार्थ व महान ग्रंथ सिद्धांत रहस्य विषय पर केंद्रित अद्भुत ज्ञान गंगा संवाहित की गयी। पुष्टिमार्गीय वल्लभ पंथ में गुरू दीक्षा को ही ब्रह्म संबंध लेना कहा जाता हैं। जो श्री वल्लभाचार्य जी के कुल के  ही किसी संत द्वारा प्रदान किया जाता हैं। तीनों दिनों के सत्संग का भावार्थ यदि अत्यंत संक्षेप में लिखा जाये तो यही होगा कि गृहस्थ होते हुए भी, लौकिक व भौतिक वैभव का त्याग किये बिना सिर्फ अनंत प्रेम व अनंत समर्पण से ही कोई भक्त श्रीकृष्ण का परमप्रिय बन सकता हैं। गोस्वामी जी की अद्वितीय विद्वता जिस पानी की सी सरलता की तरह संवाहित हुई,यह किसी ज्ञान सत्र में बहुत कम ही देखने सुनने को नसीब होती हैं। वहीं दूसरी ओैर रविवार को एक अन्य ज्ञान सत्र साईंकृष्णा रिसोर्ट में पेशे से ईएनटी विशेषज्ञ चिकित्सक व स्वभाव से श्रीकृष्ण की साधिका डॉ. माधवी पटेल के अपने आराध्य व भक्ति ज्ञान और कर्म योग के महा सम्राट योगेश्वर श्री कृष्ण के जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे भक्ति, नीति, प्रीति, रति,मैत्री और इन सबसे बढ़कर पूर्ण समर्पण पर केंद्रित प्रस्तुतिकरण का साक्षी बनने का सौभाग्य भी मिला। हालांकि माधवी जी की भाषा व शैली अत्यंत साहित्यिक व अलंकारों से सराबोर थी। द्वापर युग के जिन कुछ प्रसंगों को उन्होंनें करीब डेढ़ घंटे के अपने धारा प्रवाह सत्संग में रेखांकित करने का प्रयास किया,स्वाभाविक रूप से उन प्रसंगों की इतने कम समय में व्याख्या करना कदाचित बड़े से बड़े संत व विद्वान के लिए भी संभव नहीं होता,ऐसा मुझे लगा। पर व्याख्यान में समय की मर्यादा का प्रतिबंध मानना ही पड़ता हैं। अच्छा होता यदि वे अपने व्याख्यान को किसी भी एक प्रसंग पर ही केेंंद्रित रखती। पर उन्होनेें अपना केनवॉस काफी बड़ा रखा और उसमें श्रीकृष्ण चरित्र के अलौकिक रंग भरने के लिए उनके पास समय काफी कम था। दोनों कार्यक्रमों के ज्ञान सत्रोंं में मुझे एक तथ्य जो कॉमन लगा वह था श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम व पूर्ण समर्पण का भाव । अत: आज के अपने इस कॉलम को मैं इस सर्वस्व व पूर्ण समर्पण के भाव पर ही केंद्रित कर रहा हँू। वैसे भी दोनों कार्र्यक्रमों के कुल चार दिन के  चार ज्ञान सत्रोंं को एक पेज के कॉलम की एक ही किश्त में पूर्ण कर देने जैसी विद्वता भी मुझमें नहीं हेंैं। प्रयास करूंगा की दो या तीन अंकों में इसे पूरा कर सकूं । मैं अपना लेखकीय केनवॉस छोटा रखते हुए प्रयास करूंगा कि इस बार के कॉलम में माधवी जी द्वारा प्रस्तुत श्रीकृष्ण चरित्र के सभी प्रसंगों को प्रेम व भक्ति  की तूलिका से जीवंत बना सकंू। माधवी जी ने द्रोपदी चरित्र की इटारसी की धरा पर कदाचित पहली बार अद़भुत व्याख्या की। मैने भी विस्तार से पहली बार सुनी, बहुत अच्छा लगा। पर माधवी जी माफ करें मेरी दृष्टि में तो प्रेम व समर्पण को समझने के लिए राधा चरित्र व श्रीकृष्ण- राधा युगल चरित्र ही सर्वश्रेष्ठ हैं। मुझे नहीं पता कि आप तक मेरे विचार कभी पहुंच पायेंगें या नहीं  पर खैर...प्रारंभ ही अंत से कर रहा हँू।  अर्थात श्रीकृष्ण के अपने देवलोक गमन के प्रसंग से। क्योंकि न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता हैं कि यह प्रसंग बहुत संक्षेप में ही पर श्रीकृष्ण के समग्र चरित्र को रेखांकित करने में बहुत कुछ सक्षम हैं।
    हिरण्य, कपिला और सरस्वती का संगम। प्रभास क्षेत्र में दूर तक फैली अपूर्व शांति अश्वत्थ के सहारे मौन लेटा है कालपुरूष। हवा के साथ विशाल वृक्ष की डालियां जाने किस संवाद में खोई हैं। खोए हुए तो कृष्ण भी हैं। महाप्रयाण से पूर्व जीवन गाथा के पन्ने उलट-पलट रहे हैं। यमुना के जल में धीमे-धीमे घुल रहा है मोर पंख का रंग और इस जल के बीच सुंदर-सजल आंखें झिलमिलाती हैं, सवाल करती हैं- जा रहे हो कान्हा पर क्या सचमुच अकेले जा सकोगे? सवाल करती इन आंखों के साथ जाने कितनी आंखें याद हो आती है उन्हें । वसुदेव के साथ गोकुल भेजती देवकी की आंखें, ऊखल से बांधती यशोदा की आंखें, गोकुल में ग्वाल और गोपियों की आंखें, राजसभा में पुकारती द्रौपदी की आंखें , कुरूक्षेत्र में खड़ें अर्जुन की आंखें, प्रभास उत्सव के लिए बिदा करती रूक्मिणी की आंखें, यमुना की आंखें और यमुना की धार में विलीन होती परम प्रिया की आंखें। उन आंखों का जल कृष्ण की आंखों से बहने लगता है- तुमसे अलग होकर कहां जाऊंगा? छाया से काया कैसे अलग हो सकती है भला। जहां तुम हो, वहां मैं हूं। कृष्ण की एकमात्र शरण तुम ही तो हो। ऐसा परिहास न करो। मेरी शरण की तुम्हें क्या आवश्यकता कान्हा? कहां मैं एक साधारण-सी ग्वालिन और कहां तुम जैसा असाधारण पुरूष । तुम तो सारी सृष्टि को शरण देते हो। तुम मेरे शरणाार्थी कैसे हो सकते हो? परिहास नहीं सखी। जन्म लेते ही जिसे मां के आंचल को छोड़कर भवसागर की लहरों के बीच उतरना पड़ा, उसकी पीड़ा को तुम्हारे अतिरिक्त कौन हर सकता है? सारी सृष्टि को शरण देने की सामथ्र्य भले हो कृष्ण में, लेकिन कृष्ण को शरण देने की सामथ्र्य केवल तुम्हारे हदय में है। कौन है, जिसकी शरण का आकांक्षी है तीनों लोकों को तारने वाला असाधारण पुरूष? कृष्ण को शरण देने की सामथ्र्य रखने वाला यह हदय किसका है? कृष्ण को शरण देने वाला यह हदय उसी आराधिका का है, जो पहले राधिका बनी और फिर राधिका से कृष्ण की आराध्या हो गई। कृष्ण आराधना करते हैं, इसलिए वे राधा हैं या वे कृष्ण की आराधना करती है, इसीलिए राधिका कहलाती है। सच, बहुत कठिन है इसको परिभाषित करना, क्योंकि इसकी परिभाषा स्वयं कृष्ण हैं। खुद को असाधारण होने की सीमा तक साधारण बनाए रखने वाली यह किशोरी कृष्ण को अनायास ही मिली थी भागवत में। भागवत,रस का गीत हैं। उस गीत का रस भी और कोई नहीं, यही आराधिका है। कृष्ण राधा से पूछते हंै, राधे। भागवत में क्या भूमिका होगी तुम्हारी। राधा कहती है, मुझे कोई भूमिका नहीं चाहिए  कान्हा, मैं तो बस तेरी छाया बनकर रहूंगी, तेरे पीछे-पीछे । छाया हां, कृष्ण के प्रत्येक सृजन की पृष्ठभूमि में है।  गोवद्र्धन को धारण करने वाली तर्जनी का बल भी यही छाया है और यही छाया है लोकहित के लिए मथुरा से द्वारिका तक की विषम यात्रा करने वाले कृष्ण की आत्मशक्ति। संपूर्ण ब्रज रंगा है कृष्ण रंग में, कदंब से लेकर कालिंदी अर्थात यमुना तक। सब ओर कृष्ण ही कृष्ण। लेकिन इस कृष्ण की आत्मा बसती है राधा में। वृंदावन की कुंज गलियां हों या मथुरा के घाट हर ओर, हर तरफ बस एक नाम, एक रट,राधा राधा राधा । बांके का बांकपन भी राधा है और योगेश्वर का ध्यान भी राधा है। कृष्ण के विराट को समेटने के लिए जिस राधा ने अपने हदय को इतना विस्तार दिया कि सारा ब्रज ही उसका हदय बन गया। उसी राधा के बारे में भागवत में गोपियां पूछती है कि यह आराधिका आखिर है कौन? पहले तो कभी दिखी नहीं। कौन है वो मानिनी, जिसकी वेणी गूंथता है उनका श्याम, जिसके पैर दबाता है सलोना घनश्याम और हां जब वो रूठ जाती है तो मोर बनकर नृत्य भी करता है ।गोपियां ही नहीं, कृष्ण भी पूछते हैं, बूझत श्याम, कौन तू गोरी । लेकिन राधा को बूझना इतना सरल नहीं और राधा को बूझ पाने से भी कठिन है- राधा के प्रेम की थाह बूझ पाना। इसी अथाह प्रेम की थाह पाने के लिए एक बार लीलाधर ने एक लीला रची। स्मृतियां कृष्ण को खींच ले गईं उत्सव के क्षणों में। हर ओर खुशी का सैलाब। हास-परिहास के बीच अचानक पीड़ा से छटपटाने लगे कृष्ण।  ढोल, ढप, मंजीरे खामोश होकर मधुसूदन के मनोहारी मुख पर आती-जाती पीड़ा की रेखाओं को पढऩे लगे।  चंदन का लेप शूलांतक वटी कोमलांगी स्पर्श सब व्यर्थ। वैद्य लज्जित से एक-दूसरे को निहार रहे थे। रानी सत्या ने डबडबाती आंखों से पूछा तो उत्तर मिला, मेरे किसी परम प्रिय की चरण धूलि के लेप से ही मेरी पीड़ा ठीक हो सकती है। कृष्ण की पीड़ा बढ़ती ही जा रही है। सोलह हजार रानियां-पटरानियां करोड़ों भक्त, सखा, सहोदर सब प्राण होम करके भी अपने प्रिय की पीड़ा हरने को तैयार हैं, लेकिन प्रभु के मस्तक पर अपनी चरण धूलि लगाकर नर्क का भागी कोई नहीं बनना चाहता। सबने अपने पांव पीछे खींच लिए। राधा ने सुना तो नंगे पांव भागती चली आई। आंसुओं में चरण धूलि का लेप बनाकर लगा दिया कृष्ण के  भाल पर। सब हतप्रभ थे। यह कैसी आराधिका है, इसे नर्क  का भी भय नहीं। कृष्ण मुस्कुरा दिए, जिसने मुझमें ही तीनों लोक पा लिए हों,वो अन्यत्र किसी स्वर्ग की कामना करें भी तो क्यों? सारे संसार को मुक्त करने वाला इसीलिए तो बंधा है इस आराधिका से। कृष्ण  सबको मुक्त करते हैं, लेकिन राधा कभी मुक्त नहीं करती कृष्ण को। कृष्ण खुद भी कहां मुक्त होना चाहते हैं, ब्रज की इस गोरी के मोहपाश से। कभी-कभी रूक्मिणी छेड़ती हैं, क्या सचमुच बहुत सुंदर थी राधा? कृष्ण कहते हैं हां, बहुत सुंदर इतनी सुंदर कि उसके सामने मौन हो जाती हैं, सौंदर्य की समस्त परिभाषाएं। सूर्योपराग के समय कुरूक्षेत्र में सब उपस्थित हुए हैं । राधा भी आई है, नंद-यशोदा, गोप-ग्वाल, गोपियों के साथ। रूक्मिणी आश्चर्य में हैं । इस राधा के आते ही सारा परिवेश कैसे एकाएक नीला हो गया है। और कृष्ण का नीलवर्ण राधा के बसंत से मिलकर कैसे सावन-सावन हो उठा है। यों रूक्मिणी खुद स्वागत कर रही हैं राधा का, लेकिन कै से बावले हुए जाते हैं कृष्ण। रूक्मिणी खुद स्वागत कर रही है राधा का,लेकिन कैसे बावले हुए जाते हैं कृष्ण। एक जलन-सी उठती है मन में और यही जलन रूक्मिणी सौंप देती हैं राधा को गर्म दूध में। कृष्ण का स्मरण कर एक सांस में पी जाती हंै राधा । सारा द्वेष, सारी जलन, सारी पीड़ा, लेकिन कृष्ण नहीं झेल पाते। कृष्ण के पैर दबाते समय रूक्मिणी ने देखा कि श्री कृष्ण के पैरों में छाले हैं। मानों गर्म खौलते तेल से जल गए हों। यह क्या हुआ द्वारिकानाथ,ये फफोले कैसे? कृष्ण बोले, प्रिय राधा के हदय में बसता हूं मैं। तुम्हारे मन की जिस जलन को राधा ने चुपचाप पी लिया देखो वही मेरे तन से फूट पड़ी है। राधा को बड़भागिनी कहता है यह संसार लेकिन बड़भागी तो कृष्ण हैं, जिन्हें राधा जैसी गुरू मिली , सखी मिली, आराधिका मिली। जिसने उन्हें प्रेम, समर्पण और त्याग की वर्णाक्षरी सिखाई। तभी तो दानगढ़ में दान मांगते हैं कृष्ण । दानगढ़ जो बसा है सांकरी खोर और विलासगढ़ से विपरीत दिशा में। यहां राधा के चरणों में झुककर याचक हो जाते हैं कृष्ण । हे राधे बड़ी दानी है तू, सुना है तेरे बरसाने में जो भी आता है, वो खाली हाथ नहीं जाता। मुझे भी दान दे। प्रथम दान अपनी रूप माधुरी का। दूसरा दान तेरे अनंत रस और विलास का। दानगढ़ में कृष्ण को दिया गया, ये महादान ही पाथेय बन जाता है कृष्ण का, गैया चराने वाले गोपाल से द्वारिकाधीश बनने तक की लंबी यात्रा में। कुरूक्षेत्र से लेकर प्रभास तक राधा का यही प्रेम तो जीवन रसधार बनकर बहता रहा कृष्ण के भीतर। गीता का आधार भी यही प्रेम है औेर महारास का रस भी। वेणु हो या पांचजन्य, दोनों में एक ही स्वर फूटता है।  एक ही पुकार उठती है, राधे तेरे नैना बिंधो री बान । कृष्ण से जुड़ी हर स्त्री राधा होना चाहती है। स्वयं कृष्ण भी राधा हो जाना चाहते हैं। लेकिन कृष्ण जानते हैं कि राधा का पर्याय केवल राधा ही हो सकती है, इसीलिए तो कृष्ण बार-बार आना चाहते हैं राधा की शरण में। आंखों में एक चमक-सी कौंधती है।  दूर कालिंदी की लहरों पर एकांत पथिक-सा नि:शब्द बढ़ रहा है राधा की मन्नतों का एक दीया। कृष्ण मौन सुन रहे हैं, डूबती द्वारिका के अंधेरों से निकलती अर्थहीन आवाजें और उन आवाजों में घुलता एक सवाल, जा रहे हो कान्हा ,पर क्या सचमुच अकेले जा सकोगे?  अगले अंक के कालम के लिए वास्तव में तो यह भूमिका स्वरूप ही है। क्योंकि वल्लभाचार्य जी को 500 साल पहले ठाकुर जी ने अर्थात श्रीकृष्ण ने स्वयं सामने आकर भक्ति,प्रेम, व समर्पण का जो ज्ञान दिया था और जो सिद्धांत रहस्य ग्रंथ में समाहित हैं व जिसे गोस्वामी जी कमलेश जी ने तीन दिनों में समझाया,उसे समझने के लिए यह भूमिका आवश्यक हेैं।